शुक्राचार्य और माता लक्ष्मी का रिश्ता: देवी लक्ष्मी को बहन मानने के पीछे छिपी है यह पौराणिक कहानी
यह लेख दैत्य गुरु शुक्राचार्य और देवी लक्ष्मी के भाई-बहन के रिश्ते की पौराणिक कथा बताता है। विष्णु पुराण में ...और पढ़ें

देवी लक्ष्मी का अवतार थीं देवी भार्गवी। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में कई महागुरुओं में एक नाम दैत्य गुरु शुक्राचार्य का भी आता है। इन्हें राक्षसों का गुरु माना गया है। लेकिन जब इनके साथ देवी लक्ष्मी का नाम जोड़ा जाता है, तो भक्तआश्चर्य में पड़ जाते हैं। आखिर दोनों को भाई-बहन क्यों कहा जाता है?
इसके पीछे एक पौराणिक कथा और इस कथा का मूल वर्णन विष्णु पुराण के प्रथम अंश (स्कंध) के आठवें अध्याय में मिलता है। चलिए जानते हैं कि शुक्राचार्य और देवी लक्ष्मी किस युग में भाई-बहन थे।
क्या है पौराणिक कथा?
यह कथा द्वापर युग के महान ऋषि भृगु और उनकी पत्नी देवी ख्याति से जुड़ी हुई है। इस युग में देवी लक्ष्मी का अवतार देवी भार्गवी ,जिन्हें भू देवी भी पुकारा जाता है, भी हैं। वहीं इस युग में शुक्राचार्य का जन्म भार्गव के रूप में हुआ था। दोनों ही ऋषि भृगु और उनकी पत्नी देवी ख्याति की संतानें थे।
कथा के अनुसार एक बार देवी लक्ष्मी क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ विराजमान थीं। तब ही वहां ऋषि भृगु आए और उन्होंने क्रोध में आकर भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मारी। यह देख ऋषि से देवी लक्ष्मी नाराज हो गईं।
दरअसल, ऋषि भृगु ने एक बार यह जानने के लिए कि त्रिदेवों में सबसे श्रेष्ठ कौन है, इसके लिए तय किया कि वह तीनों के पास जाएंगे और तय करेंगे। सबसे पहले ऋषि भृगु ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी से जब उन्होंने यह सवाल किया, तो वह शांत रहे। फिर ऋषि कैलाश गए और शिव जी से भी यही सवाल किया। शिव जी ने उन्हें गले लगाना चाहा, तो ऋषि भृगु ने शिव जी को ढोंगी बता दिया। इस पर शिव जी जब ऋषि भृगु को त्रिशूल से मारने दौड़े, तो देवी पार्वती ने उन्हें बचा लिया।
ऋषि भृगु को अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था और वह इससे बहुत अधिक क्रोध में थे। क्रोधित होकर, वह जब वैकुंठ पहुंचे, तो श्री हरि विष्णु को देवी लक्ष्मी की गोद पर सिर रखे लेटा देख उन्हें और भी ज्यादा गुस्सा आया। गुस्से में ही उन्होंने श्री विष्णु को लात मार दी।
कथा में आगे बताया गया है कि श्री विष्णु को ऋषि पर क्रोध आने की जगह दया आई और वो उनके पैरों को सहलाने लगे क्योंकिउन्हें लगा कि लोहे जैसे वक्षस्थल पर लात मारकर ऋषि के पांव में चोट आ गई होगी। विष्णु जी के इस धैर्य और प्रेम को देखकर भृगु ऋषि की आंखें भर आईं और उन्होंने मान लिया कि भगवान विष्णु ही त्रिदेवों में सबसे श्रेष्ठ हैं।
देवी लक्ष्मी को क्यों आया गुस्सा
अपनी छाती पर लात पड़ने को विष्णु जी ने तो सहन कर लिया, लेकिन माता लक्ष्मी क्रोधित हो गईं। उनका वास विष्णु जी की छाती पर ही माना जाता है। इस अपमान के कारण माता लक्ष्मी ने ब्राह्मणों को यह श्राप दिया कि वे हमेशा धन-संपत्ति के अभाव में रहेंगे।
लेकिन जब भगवान श्री हरि विष्णु ने बताया कि ऋषि भृगु केवल हम त्रिदेवों की परीक्षा ले रहे थे। तब देवी लक्ष्मी को अपने किए पर पछतावा हुआ। वो अपन श्राप तो वापिस नहीं ले सकती थीं, इसलिए उन्होंने ऋषि को एक वरदान भी दिया कि वह उनकी बेटी के रूप में जन्म लेंगी ताकि उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए धन की कमी कभी न हो।
अत: इस तरह से ऋषि भृगु और देवी ख्याति के पुत्री के रूप में भार्गवी और पुत्र के रूप में भार्गव हुए। यह दोनों ही देवी लक्ष्मी और शुक्राचार्य का अवतार थे। इस नाते से शुक्राचार्य देवी लक्ष्मी के भाई हुए।
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