महादेव का वो इकलौता धाम, जहां शिवलिंग नहीं बल्कि लेटी हुई मुद्रा में हैं शिव; वजह जानकर रह जाएंगे हैरान!
आंध्र प्रदेश के सुरुतापल्ली में स्थित पल्ली कोंडेश्वरार मंदिर भारत का एकमात्र शिव मंदिर है, जहां भगवान शिव शयन मुद्रा में माता पार्वती की गोद में विरा ...और पढ़ें

पल्ली कोंडेश्वरार मंदिर, आंध्र प्रदेश

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर जब हम किसी भी शिव मंदिर में जाते हैं, तो गर्भगृह में हमें शिवलिंग या कुछ खास मंदिर में (जैसे चिंदबरम) में भगवान शिव से जुड़ी नटराज मुद्रा वाली मूर्ति के दर्शन होते हैं। लेकिन भारत में शिवजी से जुड़ा एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां भगवान शिव लेटी हुई मुद्रा में दिखाई देते हैं। कई स्थानीय भाषा में इसे 'भोगान' कहा जाता है, जिसमें महादेव माता पार्वती की गोद में आराम कर रहे होते हैं।
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के सुरुतापल्ली गांव में स्थित है, पल्ली कोंडेश्वरार मंदिर, जिसे सुरुतापल्ली मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय लोगों के अलावा आंध्र प्रदेश के आस-पास के राज्य से भी लोग भगवान शिव के इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा काफी प्रचलित है।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा?
स्थल पुराण वह पुराण हैं, जिसमें तीर्थ, मंदिर, वहां स्थापित देवता, तालाब और वृक्ष आदि के महात्मय का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार, कहा जाता है कि, जब देवताओं और असुरों ने अमरता हासिल करने के लिए अमृत ग्रहण का निश्चय किया, तब दोनों पक्ष वासुकी और मंधार पर्वत की मदद से समुद्र मंथन किया।
समुद्र मंथन के दौरान दबाव न सहन कर पाने के कारण वासुकी ने अपने मुख से जहर उगल दिया। तब देवताओं और राक्षसों ने विष के हानिकारक प्रभावों से बचने के लिए शिवजी से मदद की गुहार की। देवताओं और असुरों की सहायता करने के लिए भगवान शिव ने विषभकरण मूर्ति का रूप धारण करके विष को पी लिया।
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विष ग्रहण करने के बाद उन्हें थोड़ा चक्कर आने लगा। जब वे लेट गए तो उनकी पत्नी मां पार्वती ने भगवान का सिर अपनी गोद में रखा और धीरे से उनकी गर्दन दबाई, जिससे जहर उनके शरीर को प्रभावित किए बिना ही गले में रह गया। इस घटना के बाद से ही भगवान शिव को नीलकंठ के नाम से भी जाना जाने लगा।

भगवान शिव देवी पार्वती की गोद में आराम कर रहे थे। उसी दौरान सभी देवता, महर्षि और ऋषि भगवान शिव से मिलने के लिए इक्ट्ठा हए थे, जिस कारण इस स्थान का नाम सुरुतपल्ली पड़ा। सुरुत का मतलब देवताओं का जमावड़ा।
समुद्र मंथन के 13वें दिन (त्रयोदशी तिथि) भगवान विष्णु अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए, इसीलिए इस दिन धनतेरस मनाया जाता है,जो कार्तिक मास में आती है। अमृत प्राप्त करके सभी देवता काफी खुश हुए और भगवान शिव के समर्पण के प्रति आभार प्रकट किया।
अमृत कलश प्राप्त करने पर सभी देवता खुशी से भगवान शिव के पास पहुंचे। माना जाता है कि, यह घटना शाम के समय हुई थी, जिसे प्रदोष काल का समय कहा जाता है। प्रत्येक महीने में 2 बार चंद्र कैलेंडर के मुताबिक, 13वें दिन शाम 5 बजे से लेकर 6 बजकर 30 मिनट के बीच का समय प्रदोष काल होता है। हिंदू धर्म में इसे काफी शुभ माना जाता है, क्योंकि प्रदोष का मतलब जब आप अपनी सभी नकारात्मकताओं से मुक्ति पा सकते हैं।
मंदिर में भगवान शिव की शयन मूर्ति का महत्व
पल्ली कोंडेश्वरार मंदिर की मुख्य मूर्ति सर्वमंगल समेता श्री पल्लीकोंडेश्वर स्वामी की है। स्थानीय लोग इस मंदिर को सायण शिवालयमु, प्रदोष क्षेत्रमु और नंदी क्षेत्रमु भी कहते हैं। इस मंदिर को विजयनगर राजवंश के दौरान हरिहर बुक्करय द्वारा 1344 से 1377 के बीच बनाया गया था।
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