तिब्बत से लेकर देवभूमि तक फैले हैं भगवान शिव के 5 कैलाश, हर शिखर से जुड़ी है एक अनोखी कथा
श्रावण मास में भगवान शिव के निवास स्थान माने जाने वाले 'पंच कैलाश' का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इन पांच पवित्र स्थलों की पौराणिक कथाओं और आध्यात् ...और पढ़ें

हिंदू धर्म पंच कैलाश का आध्यात्मिक महत्व

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। श्रावण मास के बारे में कई तरह की प्रचलित मान्यताएं और किवदंतियों के अनुसार, इस पवित्र महीने के दौरान भगवान शिव, माता पार्वती, पुत्र कार्तिकेय, गणेश और वाहन नंदी के साथ धरती पर निवास करने आते हैं। जब कभी भी हमारे मन में महादेव के निज निवास स्थान का ख्याल आता है, तो सबसे पहला नाम कैलाश पर्वत का आता है।
शिव पुराण, स्कंद पुराण और हिंदू धर्म से जुड़े कई धार्मिक कथाओं में कैलाश पर्वत को भगवान शिव का घर बताया गया है। भले ही वर्तमान समय में कैलाश पर्वत चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का हिस्सा है, लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि, भारत में कैलाश पर्वत की तरह अन्य कई पर्वत हैं, जिनका हिंदू शास्त्रों, पुराणों और इस धर्म को मानने वाले अनुयायियों के बीच काफी महत्व है। इन्हें 'पंच कैलाश' के नाम से जाना जाता है।
माना जाता है कि, पंच कैलाश की यात्रा भगवान शिव के निवास स्थान से संबंध रखती है, जो आज के युग में भी काफी प्रसांगिक और अध्यात्म के नजरिए से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हजारों भक्त शिव की शक्ति को महसूस करने और उनके दिव्य आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए पंच कैलाश की यात्रा करते हैं। आइए जानते हैं इसके बारे में।

कैलाश मानसरोवर
पंच कैलाश यात्राओं में कैलाश मानसरोवर सबसे प्रमुख मानी जाती है। चीन के तिब्बत के नगारी प्रांत में स्थित कैलाश पर्वत को ब्रह्मांड का आध्यात्मिक केंद्र भी माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में इस स्थान को स्वर्ग से जोड़ा जाता है। कैलाश मानसरोवर झील जिसे लेकर मान्यता है कि, इसके जल को पीने जन्मों-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।
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आदि कैलाश
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में कैलाश मानसरोवर से तकरीबन 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आदि कैलाश पर्वत को कैलाश पर्वत के रूप में ही पूजा जाता है। इसे छोटा कैलाश के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाएं बताती हैं कि, इस छोटे और पवित्र शिखर पर भगवान शिव ने ध्यान और योग साधना का अभ्यास किया था, इसी कारण उन्हें आदि योगी का नाम मिला।
माना जाता है कि, कैलाश मानसरोवर से शुरू हुई भगवान शिव और माता पार्वती की विवाह यात्रा त्रियुगीनारायण मंदिर पहुंचने से पहले यहीं रुकी थी। आदि कैलाश शिखर के नजदीक भगवान शंकर और माता गौरा को समर्पित एक मंदिर भी है और साथ ही यहां पार्वती सरोवर झील भी है।

मणि महेश
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित मणि महेश को भगवान शिव द्वारा माता पार्वती से शादी के बाद निर्मित माना जाता है। पर्वत की छोटी पर स्थित एक चट्टान को भगवान शिव का अवतार माना जाता ह, क्योंकि यह बिल्कुल शिवलिंग जैसी दिखाई देती है।
माना जाता है कि, यहां भगवान शिव ने 700 सालों तक तपस्या की थी। मणि महेश झील की भी अत्यंत महिमा है। इस झील में नहाने के साथ तीन बार परिक्रमा करने से शिव भक्तों के पाप धुल जाते हैं।

किन्नौर कैलाश
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित किन्नौर कैलाश वही स्थान बताया जाता है जहां भगवान शिव माता पार्वती से पहली बार मिले थे। हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान शिव हर शीतकाल में किन्नौर कैलाश शिखर पर देवी-देवताओं की सभा आयोजित करते थे। महाभारत काल में अर्जुन को यहीं भगवान शिव द्वारा पशुपतास्त्र मिला था।
किन्नौर कैलाश में स्थित इस शिवलिंग की अनोखी खासियत यह है कि, यह दिन भर में कई बार रंग बदलता है। सूर्योदय से पहले सफेद और सूर्योदय के बाद पीला और सूर्यास्त के बाद यह लाल हो जाता है और रात में यह काला हो जाता है।

श्रीखंड कैलाश
पंच कैलाश यात्राओं में सबसे कठिन श्रीखंड महादेव तक पहुंचना है। यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के जौन गांव में स्थित है और तीर्थयात्रियों के लिए सिर्फ श्रावण माह में ही खुला रहता है। श्रीखंड महादेव में स्थित शिवलिंग करीब 75 फीट ऊंचा है और यह सबसे विशाल शिवलिंगों में से एक है।
श्रीखंड कैलाश पर्वत के पास माता पार्वती, भगवान गणेश और स्वामी कार्तिकेय की मूर्तियां स्थापित हैं। यहां कई गुफाएं है और ऐसा माना जाता है कि, श्रीखंड महादेव में भगवान शिव को जो भी अर्पण किया जाता है, वह इन्हीं गुफाओं में जाता है।
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