सिर्फ 1 या 3, जानें किस देवता की कितनी परिक्रमा करने से मिलता है पूजा का पूर्ण फल?
क्या आप जानते हैं कि किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए? अगर नहीं तो आइए यहां जानते हैं। ...और पढ़ें

Pradakshina Rules: परिक्रमा से जुड़ी ये बातें जो सभी को जाननी चाहिए। (Ai Generated Image)
HighLights
हर देवता की परिक्रमा की संख्या अलग होती है
शिवलिंग की जलाधारी को लांघना नहीं चाहिए
गणेश जी की 3 और सूर्य देव की 7 परिक्रमा होती है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में देव दर्शन के बाद परिक्रमा करने का विशेष महत्व है। मंदिर की परिक्रमा करना केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक वजह भी है। अक्सर भक्त मंदिर जाकर अनगिनत परिक्रमा करने लगते हैं, लेकिन शास्त्रों में हर देवी-देवता के लिए परिक्रमा की एक निश्चित संख्या बताई गई है। अगर नियम के अनुसार परिक्रमा न की जाए, तो पूजा का पूरा फल नहीं मिलता है।

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परिक्रमा का महत्व
'प्र' का मतलब है मोक्ष, 'द' का मतलब है पापों का नाश, 'क्षि' का मतलब है जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति और 'णा' का मतलब है ज्ञान की प्राप्ति। परिक्रमा करने का सीधा सा मतलब है, भगवान को अपने जीवन का आधार मानना। ऐसा करने से हमारा मन शांत रहता है और हमारी पूरी ऊर्जा भगवान की सकारात्मक शक्ति से जुड़कर एक हो जाती है।
किस देवता की कितनी बार करें परिक्रमा?
- भगवान गणेश - प्रथम पूज्य श्री गणेश की 3 परिक्रमा करने का विधान है। उनकी तीन परिक्रमा करने से बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है और कामों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
- भगवान विष्णु और उनके अवतार - भगवान विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण की 4 परिक्रमा करनी चाहिए। चार की संख्या धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों का प्रतीक मानी जाती है।
- सूर्य देव - सूर्य देव की 7 परिक्रमा की जाती है। यह संख्या सूर्य के रथ के सात घोड़ों और प्रकाश के सात रंगों का प्रतीक मानी जाती है। सात परिक्रमा करने से आरोग्य और तेज की प्राप्ति होती है।
- देवी दुर्गा - मां दुर्गा या किसी भी देवी शक्ति की 1 परिक्रमा ही करनी चाहिए।
- भगवान शिव - शिवजी की परिक्रमा का नियम सबसे अलग है। उनकी आधी परिक्रमा की जाती है। शिवलिंग की जलाधारी (सोमसूत्र) को कभी नहीं लांघना चाहिए, इसलिए जहां से जल बहता है, वहीं से वापस लौट जाना चाहिए।
अधूरी परिक्रमा क्यों मानी जाती है पूर्ण?
शिवलिंग के मामले में आधी परिक्रमा ही पूर्ण मानी जाती है, क्योंकि जलधारी (सोमसूत्र) में शिव और शक्ति की ऊर्जा प्रवाहित होती है। इसे लांघने से शरीर में ऊर्जा का असंतुलन हो सकता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे वर्जित माना गया है और आधे से लौटना ही 'पूर्ण फलदायी' माना गया है।
परिक्रमा के दौरान रखें इन बातों का ध्यान
- परिक्रमा हमेशा दाहिनी ओर से शुरू करनी चाहिए।
- परिक्रमा करते समय मन शांत रखें और इष्ट देव के मंत्रों का जाप करें।
- हथेलियों को खुला न रखें, उन्हें नमस्कार की मुद्रा में रखें।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।