बिना उद्यापन के निष्फल है पूर्णिमा व्रत, भविष्यपुराण में बताए गए हैं सटीक नियम
यदि आप भविष्यपुराण में बताए गए नियमों का ध्यान रखकर अगर आप पूर्णिमा व्रत का उद्यापन करते हैं, तो इससे सभी संकट दूर हो जाते हैं। ...और पढ़ें

पूर्णिमा व्रत उद्यापन की विधि (AI Generated Image)
HighLights
हर माह में किया जाता है पूर्णिमा व्रत
होती जाती है भगवान विष्णु की पूजा
बिना उद्यापन के निष्फल है पूर्णिमा व्रत
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, किसी भी व्रत को तभी पूर्ण माना जाता है, जब उसका सही ढंग से उद्यापन किया गया हो। धर्म में पूर्णिमा व्रत को एक अत्यधिक महत्वपूर्ण तिथि माना गया है, जिसपर कई साधक व्रत भी करते हैं।
पूर्णिमा का व्रत करने से मन को चंद्रमा जैसी शीतलता मिलती है। यदि आप भी पूर्णिमा का व्रत करते हैं, तो भविष्यपुराण में वर्णित इस विधि से उसका उद्यापन जरूर करें, ताकि आपको व्रत का पूरा पुण्य प्राप्ति हो।
इस तरह करें उद्यापन की तैयारी
- सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई करें और स्नान आदि से निवृत हो जाएं।
- संभव हो तो पूजा स्थल की भूमि को गाय के गोबर से लीप लें या फिर आप गंगाजल का छिड़काव भी कर सकते हैं।
- इसके बाद पूजा स्थल पर 'चौक' बनाएं और इसके मध्य में मिट्टी का कलश स्थापित करें।
- कलश में जल, सुपारी, हल्दी की गांठ, और चावल भरें और इसपर स्वस्तिक बनाकर ऊपर आम के पत्ते रखें।
- अब भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं।
- पूजा में कलावा, चंदन, फूल और माला अर्पित करें।
- पूर्णिमा व्रत कथा सुनें और भगवान को चावल से बनी खीर का भोग लगाएं।
- अंत में सभी लोगों को प्रसाद बांटें।
जरूर करें ये काम
- पूर्णिमा व्रत के उद्यापन के दौरान हवन जरूर करवाना चाहिए।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-दक्षिणा देकर उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करें।
- आप इस दिन पर सफेद वस्तुएं जैसे चावल, चीनी, या दूध का दान कर सकते हैं।
- रात में चंद्रमा को कच्चा दूध और जल मिलाकर अर्घ्य दें।
- उद्यापन की रात सोना नहीं चाहिए, बल्कि पूरी रात भजन, कीर्तन करते हुए जागरण करें।
इन बातों का विशेष ध्यान रखें
- भविष्यपुराण के अनुसार, पूर्णिमा व्रत के उद्यापन के लिए ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। हालांकि, आप किसी भी अन्य पवित्र माह की पूर्णिमा पर उद्यापन कर सकते हैं।
- जब ब्राह्मण और अतिथि भोजन कर लें, उसके बाद ही व्रती को भोजन करना चाहिए।
- उद्यापन के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष की भावना न रखें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।