जब बाली का वध बना द्वापर युग में श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण, कम ही लोगों ने सुनी होगी यह पौराणिक कथा
क्या भगवान को भी भुगतना पड़ता है कर्मफल? जानिए त्रेतायुग में श्रीराम द्वारा किए गए बाली वध और द्वापर में श्रीकृष्ण की मृत्यु के बीच का गहरा कनेक्शन ।

श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण। (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में कर्म को सबसे ऊपर माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि कर्म का फल न केवल साधारण मनुष्यों को नहीं बल्कि स्वयं भगवान को भी भुगतना पड़ता है। रामायण और महाभारत के बीच का एक ऐसा ही प्रसंग है बाली वध और श्रीकृष्ण की मृत्यु का कनेक्शन, जिससे हमें यह सीखने को मिलता है कि विधि का विधान कभी नहीं बदलता।

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भगवान श्रीराम के हाथों बाली वध
रामायण के किष्किंधा कांड के अनुसार, जब भगवान श्रीराम लक्ष्मण जी के साथ सीता माता की खोज में निकले, तब उनकी भेंट सुग्रीव से हुई। सुग्रीव के भाई बाली ने न केवल सुग्रीव की पत्नी को छीन लिया था, बल्कि उसे राज्य से भी निकाल दिया। सुग्रीव की मदद करने के लिए श्रीराम ने पेड़ के पीछे छिपकर बाली पर तीर चलाया और उसका वध कर दिया।
मरते समय बाली ने श्रीराम से एक प्रश्न पूछा कि हे राघव, मैं आपका शत्रु नहीं था, फिर भी आपने छिपकर मुझ पर प्रहार क्यों किया? एक वीर की तरह सामने आकर युद्ध क्यों नहीं किया?
श्रीराम का जवाब और कर्म का बीज
श्रीराम ने तर्क दिया कि बाली ने अपने छोटे भाई की पत्नी पर कुदृष्टि डालकर अधर्म किया था और अधर्मी का अंत किसी भी तरह से उचित है। हालांकि, बाली के मन में वह छल की टीस रह गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीराम ने बाली को आश्वासन दिया कि अगले जन्म में वह यानी कि बाली उनकी मृत्यु की वजह बनेगा, ताकि कर्म का हिसाब बराबर हो सके।
जरा शिकारी और श्रीकृष्ण
युग बदला और भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। महाभारत युद्ध के बाद, जब यदुवंश का विनाश निकट था, तब श्रीकृष्ण एक जंगल में पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे। उसी समय जरा नाम का एक शिकारी वहां मृग यानी हिरण के शिकार के लिए आया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग का बाली ही द्वापर युग में जरा शिकारी बनकर जन्मा था। जरा ने दूर से श्रीकृष्ण के हिलते हुए पैरों को देखा और उसे मृग की आंख समझकर विषैला तीर चला दिया। यह तीर श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा, जो उनके शरीर का एकमात्र कोमल हिस्सा था।
न्याय का चक्र पूरा हुआ
जब जरा शिकारी पास आया, तो भगवान को देख वह रोने लगा। तब श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उसे त्रेतायुग की याद दिलाई और कहा कि यह मेरे ही पूर्व जन्म के कर्म का विधान है। त्रेता में मैंने तुम्हें छिपकर मारा था, आज तुमने मुझे छिपकर तीर मारा। आज कर्म का यह चक्र पूरा हुआ।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
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