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    रावण को मिले थे ये श्राप, इसीलिए बलपूर्वक माता सीता को छूने से डरता था लंकापति

    Updated: Fri, 22 May 2026 04:55 PM (IST)

    लंकापति रावण महाशक्तिशाली होकर भी अशोक वाटिका में माता सीता को बलपूर्वक क्यों नहीं छू पाया था आइए इस आर्टिकल में जानते हैं। ...और पढ़ें

    Ramayana Secrets: किन श्राप के कारण रावण माता सीता को छू नहीं सकता था?

    Ramayana Secrets: किन श्राप के कारण रावण माता सीता को छू नहीं सकता था?

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण में लंकापति रावण को एक परम ज्ञानी, प्रकांड पंडित दिखाया गया है। वह इतना शक्तिशाली था कि उसने यमराज, कुबेर और इंद्र सहित सभी देवी-देवताओं को हराकर अपने अधीन कर लिया था, लेकिन जब उसी महाशक्तिशाली रावण ने माता सीता का हरण किया, तो उन्हें अपनी लंका के महलों में रखने के बजाय अशोक वाटिका में रखा।

    माता सीता रावण की कैद में रहीं, लेकिन रावण ने कभी भी उनके साथ बलपूर्वक दुराचार करने का साहस नहीं किया। धार्मिक दृष्टि से इसके पीछे रावण का कोई धर्म नहीं था, बल्कि इसके पीछे छिपे थे भयंकर श्राप।

    इन श्राप से रावण डरता था और जानता था कि माता सीता को छूते ही उसका अंत तय है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में इस पूरी कथा और श्राप के बारे में विस्तार से बताया गया है, तो आइए उस कथा को पढ़ते हैं।

    Ramayana Secrets

     AI Generated image

    कुबेर के पुत्र नलकुबेर का वो भयंकर श्राप

    ''नचेत्कामामुपैति त्वाम् प्रधर्षयति योषितम्।
    मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविष्यति।।''

    वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड कथा के अनुसार, रावण अपनी विजय यात्रा पर निकला हुआ था और सभी लोकों को जीतते हुए स्वर्ग लोक की ओर बढ़ रहा था। इसी दौरान उसकी नजर धनराज कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नि अप्सरा रंभा पर पड़ी। रंभा बेहद सुंदर थी और रिश्ते में रावण की बहू के समान थी। रावण ने रंभा की इच्छा के बिना उसके साथ बलपूर्वक दुराचार किया।

    जब इस घोर पाप की बात नलकुबेर को पता चली, तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद वह (रावण) किसी भी स्त्री को इच्छा के बिना छुएगा या उसके साथ बलपूर्वक दुराचार करने की कोशिश करेगा, तो उसी समय उसके सौ टुकड़े हो जाएंगे और तुरंत मृत्यु हो जाएगी।

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    ब्रह्मा जी का श्राप भी बना माता सीता का ढाल

    ''पितामहेन मे पूर्वं समया प्रदिष्टा पुरा।
    प्रधर्षयति यामद्यां नारीं मदनमोहितः।।
    मूर्धा तु शतधा तस्य शकलीभविष्यति।
    तस्माद्भीतेन मे सीता नाधिरूढा वराङ्गना।।''

    रावण ने एक बार 'पुंजिकस्थला' नामक अप्सरा के साथ भी दुर्व्यवहार किया था, जो ब्रह्मा जी की सभा में रहती थी। इस घटना से क्रोधित होकर साक्षात सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने भी रावण को यही श्राप दिया था कि किसी भी पर-स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे छूने पर रावण का सिर फटकर भस्म हो जाएगा।

    यही वजह थी कि जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तब भी वह नलकुबेर और ब्रह्मा जी के उस श्राप के बंधन में पूरी तरह जकड़ा हुआ था। वह जानता था कि अगर उसने अशोक वाटिका में माता सीता की इच्छा के बिना उन्हें छूने की कोशिश की, तो उसका अंत तय है। इसी डर से रावण केवल दूर खड़े होकर माता सीता को डराता था, लेकिन उन्हें स्पर्श करने की हिम्मत नहीं कर पाता था।

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