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    रमजान 2026: आखिरी अशरा शुरू, इन 10 दिनों की इबादत से मिलेगी जन्नत, क्या है एतिकाफ के नियम?

    Updated: Wed, 11 Mar 2026 01:30 PM (IST)

    रमजान 2026 का आखिरी अशरा (जहन्नम से आजादी के 10 दिन) शुरू हो चुका है। यह 10 मार्च की शाम से शुरू होकर 19 मार्च 2026 तक रहने की संभावना है। जानें इसका ...और पढ़ें

    Ramzan 2026: रमजान का आखिरी अशरा क्यों है खास? (Image Source: AI-Generated)

    Ramzan 2026: रमजान का आखिरी अशरा क्यों है खास? (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। रहमतों और बरकतों का पवित्र महीना रमजान अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। रमजान के महीने (Ramzan ka mahina) को तीन हिस्सों (अशरों) में बांटा गया है। और, इसका तीसरा यानी आखिरी अशरा बहुत ही खास होता है।

    यह आखिरी 10 दिनों का समय इस्लाम में इबादत और दुआओं के नजरिए से सबसे ज्यादा अहमियत रखता है। इस आखिरी अशरे का महत्व क्या है, एतिकाफ (Itikaf) का मतलब क्या होता है और 'शब-ए-कद्र' की रात इतनी खास क्यों मानी जाती है। आइए जानते हैं।

    आखिरी अशरा क्या है?

    रमजान के 21वें रोजे से लेकर चांद रात (29वें या 30वें रोजे) तक के समय को 'आखिरी अशरा' कहा जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, रमजान का पहला अशरा 'रहमत' (कृपा) का, दूसरा 'मगफिरत' (पापों से माफी) का और यह तीसरा अशरा 'जहन्नम से आजादी' (दोजख की आग से बचाव) का होता है।

    अधिकतर शब-ए-कद्र (Shab-e-kadr) रमजान की 27वीं रात को होती है। इन 10 दिनों में मुसलमान अपनी इबादत (पूजा) और दुआओं को बढ़ा देते हैं ताकि वे अल्लाह की रजा हासिल कर सकें।

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    (Image Source: AI-Generated)

    एतिकाफ का महत्व (दुनियादारी से दूरी)

    • आखिरी अशरे में सबसे अहम इबादतों में से एक 'एतिकाफ' है। एतिकाफ का सीधा सा मतलब है- दुनियादारी, मोबाइल और आम कामकाज छोड़कर खुद को पूरी तरह से अल्लाह की इबादत के लिए एकांत में समर्पित कर देना।
    • आमतौर पर रोजेदार 20वें रोजे की शाम (सूरज डूबने से पहले) मस्जिद के किसी एकांत कोने में (और औरतें घर के किसी शांत हिस्से में) बैठ जाते हैं और ईद का चांद नजर आने तक वहां से बाहर नहीं निकलते।
    • मशहूर हदीस की किताब 'सहीह बुखारी' में जिक्र आता है कि पैगंबर मोहम्मद साहब (SAW) हर साल रमजान के आखिरी 10 दिनों में एतिकाफ में बैठा करते थे। इसलिए इसे एक बहुत ही प्यारी 'सुन्नत' (पैगंबर का तरीका) माना जाता है।

    शब-ए-कद्र: हजार महीनों से बेहतर रात

    इस आखिरी अशरे की सबसे बड़ी खासियत 'शब-ए-कद्र' (लैलतुल कद्र) है। इसे 'कद्र की रात' या 'फैसले की रात' भी कहते हैं।

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    'कुरान-ए-पाक' (सूरह अल-कद्र) में साफ तौर पर बताया गया है कि शब-ए-कद्र की इबादत हजार महीनों (लगभग 83 साल) की इबादत से भी बेहतर है। माना जाता है कि इसी पवित्र रात में अल्लाह ने कुरान को दुनिया में उतारना शुरू किया था।

    यह रात कौन सी है, इसका कोई एक दिन तय नहीं है। हदीसों के अनुसार, इसे रमजान के आखिरी 10 दिनों की 'ताक रातों' (विषम/Odd nights) यानी 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं या 29वीं रात में तलाशने को कहा गया है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।