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समुद्र मंथन से निकले 4 दिव्य रत्नों की कलियुग में भी होती है पूजा, क्या है इनका धार्मिक महत्व?

Published: Wed, 08 Jul 2026 02:36 PM (GMT+05:30)

समुद्र मंथन से कई अनमोल रत्न निकले जिन्हें अलग जगहों पर विशेष स्थान प्राप्त है। मुख्य रूप से इसमें 14 ...और पढ़ें

समुद्र मंथन के वे दिव्य रत्न जिनकी कलियुग में भी होती है विशेष पूजा (Picture Credit: AI Generated)

समुद्र मंथन के वे दिव्य रत्न जिनकी कलियुग में भी होती है विशेष पूजा (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। समुद्र मंथन में मुख्य रूप से 14 रत्न निकले थे जिनका अपना अलग महत्व है। इस दौरान क्षीर सागर का मंथन किया गया जिसमें मथानी के रूप में मंदराचल पर्वत को रखा गया था।

इसका पौराणिक महत्व बहुत ज्यादा है और इस दौरान कई रत्न प्रकट हुए जिन्हें अलग-अलग स्थानों में ले जाया गया। समुद्र मंथन के दौरान जो रत्न निकले उनमें से चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, ऐरावत हाथी, कामधेनु गाय, मदिरा या वरुणी, कल्पवृक्ष, अप्सराएं, उच्चैश्रव घोड़ा, धन की देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु का शंख पांचजन्य, शारंग, कौस्तुभ मणि, धन्वंतरि और अमृत कलश थे।

इनमें से कुछ रत्न पृथ्वी पर गए, तो कुछ को इंद्र लोक भेजा गया। यही नहीं इनमें से निकले विष को जहां एक तरफ भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया वहीं अमृत का विभाजन देवताओं के बीच हुआ।

इस पौराणिक घटना के दौरान कुछ ऐसे भी दिव्य रत्न निकले जिनकी कलियुग में भी पूजा होती है और ये मोक्ष का द्वार प्रदान करने वाले माने जाते हैं। आइए जानें उन रत्नों के बारे में।

माता लक्ष्मी

समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ और वो भगवान विष्णु की अर्धांगिनी बनीं। आज भी माता लक्ष्मी को धन की देवी के रूप में पूजा जाता है और जो व्यक्ति उनकी पूजा पूरे श्रद्धा भाव से करता है उसके जीवन में सदैव समृद्धि बनी रहती है।यही नहीं माता लक्ष्मी की पूजा से भक्तों को धन और ऐश्वर्य का आशीर्वाद भी मिलता है और उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी बनी रहती है। कलियुग में मुख्य रूप से कुछ त्योहारों जैसे दीपावली के दिन माता लक्ष्मी का पूजन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

चंद्रमा

समुद्र मंथन से निकले चंद्रमा का कलियुग में भी विशेष महत्व और इसकी पूजा पूरे विधि-विधान के साथ की जाती है। कुछ विशेष अवसरों जैसे पूर्णिमा या फिर करवा चौथ के दौरान चंद्रमा की पूजा विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है और इससे शुभ फलों की प्राप्ति भी होती है।

भगवान धन्वंतरि

भगवान धन्वंतरि को कलियुग में महान वैद्य यानी चिकित्सक के रूप में पूजा जाता है। उन्हें रोग-दोष दूर करने वाला माना जाता है। धन्वन्तरि की पूजा के लिए धनतेरस का दिन विशेष माना जाता है और इसी दिन को उनके प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

उनकी पूजा से घर के रोग-दोष दूर रहते हैं और उन्हें आज भी देवताओं के वैद्य का स्थान दिया गया है। निरोगी काय का आशीर्वाद लेने के लिए आज भी उनका पूजन किया जाता है।

कामधेनु गाय

कामधेनु गाय को सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना जाता है और कलियुग में भी उनकी पूजा इच्छा पूर्ति के लिए की जाती है।

कामधेनु में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास माना जाता है और कलियुग में जो व्यक्ति गौ पूजन करता है उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होने के साथ सभी देवताओं की एक साथ पूजा भी होती है।

पंचजन्य शंख

समुद्र मंथन से निकला पंचजन्य शंख विजय का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ या अनुष्ठान की शुरुआत में शंख नाद किया जाता है।

शंख नाद का मतलब किसी भी काम की सफल शुरुआत माना जाता है और इसे पूजा को अच्छी तरह से सफल करने का भी एक माध्यम माना जाता है।
कलियुग में भी पूजा और अनुष्ठानों में किया गया शंख नाद किसी भी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके घर में सकारात्मकता लाता है।

ये कुछ ऐसे रत्न हैं जिनकी पूजा से कलियुग में भी लोगों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और धन, ऐश्वर्य, मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है।

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