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सावन की बारिश और भगवान शिव का क्या है गहरा नाता? पुराणों में छिपे इस रहस्य के बारे में नहीं जानते होंगे आप

Updated: Mon, 10 Aug 2026 10:00 AM (IST)

सावन में होने वाली बारिश का भगवान शिव से गहरा संबंध है, जिसका जिक्र शिव महापुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। समुद्र मंथन के दौरान विषपान से शिव के कं ...और पढ़ें

सावन की बारिश और भगवान शिव का अद्भुत संबंध, जानें पौराणिक रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

सावन की बारिश और भगवान शिव का अद्भुत संबंध, जानें पौराणिक रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. सावन की बारिश शिव के जलाभिषेक का प्रतीक।

  2. समुद्र मंथन में विषपान से शिव हुए नीलकंठ।

  3. इंद्र देव ने वर्षा कर शिव की अग्नि शांत की।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि सावन का महीना आते ही बारिश क्यों होने लगती है? क्या मन में ये सवाल आता है कि भगवान शिव का बारिश से क्या नाता हो सकता है? वास्तव में इस महीने से जुड़े कुछ ऐसे रहस्य हैं जो सावन और शिव के संबंध को दिखाते हैं।

इस मौसम में पड़ने वाली बारिश की हर एक बूंद का एक अलग महत्व होता है और शिव महापुराण ही नहीं बल्कि स्कंद पुराण में भी इस बात का जिक्र मिलता है कि सावन में ही बारिश क्यों होती है और इस बारिश का भगवान शिव से कैसे एक अनोखा जुड़ाव है। आइए आपको बताते हैं बारिश के इस मौसम और भगवान शिव के बीच के संबंध के बारे में कुछ जरूरी बातें।

भगवान शिव और सावन की बारिश का संबंध

सावन हिंदू पंचांग का पांचवा महीना है जो अक्सर जुलाई या अगस्त के बीच आता है। इस समय धरती पर मानसून भी दस्तक देता है और बारिश की बूंदें पृथ्वी पर गिरने लगती हैं।

धार्मिक दृष्टिकोण से यह बारिश केवल मौसम की दस्तक नहीं मानी जाती है बल्कि शिव महापुराण में लिखा है कि इस महीने जल का गिरना भगवान शिव के जलाभिषेक का प्रतीक भी होता है। इस दौरान मनुष्य ही नहीं बल्कि देवतागण भी भगवान शिव का बारिश के रूप में जलाभिषेक करते हैं।

सावन और शिव जी के संबंध से जुड़ी पौराणिक कथा

प्राचीन काल की बात है जब देवता और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। इस समुद्र मंथन में सबसे पहले हलाहल विष निकला जिसमें इतनी शक्ति थी कि वह संपूर्ण विश्व का विनाश कर सकता था। उस समय भगवान शिव ने इस विष को होने कंठ में रोक लिया और तभी से वो नीलकंठ कहलाए।

हलाहल विष इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव का कंठ भी इसके प्रभाव से जलने लगा और जब वह विष उनके कंठ में रुका तो उसकी तेज अग्नि से पूरे ब्रह्मांड में अग्निकांड शुरू हो गया। संपूर्ण पृथ्वी में अग्नि उत्पन्न हो गई, वनों में आग लग गई, इस ज्वाला से पर्वत पिघलने लगे और नदियां सूखने लगी। सभी जीव-जंतु भी इस अग्नि से मरने लगे।

उस समय देवताओं ने इंद्र देव से प्रार्थना की और वर्षा का आग्रह किया। उस समय आकाश में डमरू की ध्वनि सी गूंज उठी और शिव तांडव होने लगा। उस समय इंद्र देव ने बारिश की और बारिश की हर एक बूंद शिव के कंठ में उठती अग्नि को शांत करती गई। जैसे-जैसे बारिश की बूंदें शिव जी के शरीर पर पड़ीं उनके कंठ की ज्वाला शांत होती गई। उसी समय से आज भी सावन के महीने में बारिश होती है और इस पावन महीने को शिव जी का महीना माना जाता है।

सावन का महीना शिव जी को समर्पित होता है

सावन में भगवान शिव की पूजा केवल एक परंपरा नहीं है बल्कि यह एक ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का माध्यम भी माना जाता है। मुख्य रूप से सावन महीने के सभी सोमवार शिव पूजा के लिए प्रमुख माने जाते हैं और इस दिन भक्त भगवान शिव का श्रद्धा से जलाभिषेक करते हैं। जो भक्त सावन में सच्चे मन से शिव का पूजन और जलाभिषेक करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।

वास्तव में सावन और शिव का संबंध अटूट है और प्राचीन समय से चली आ रही ये परंपरा आज भी मौजूद है जब हर सावन में बारिश होती है और भक्त शिव जी का पूजन श्रद्धा भाव से करते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।