शनिवार स्पेशल: हनुमान चालीसा के सप्त पाठ का चमत्कार, जान लीजिए ये गुप्त नियम
शनिवार का दिन न्याय के देवता शनि देव को समर्पित है। ...और पढ़ें

Saturday Rules: शनिवार पूजा नियम। (Image Source: AI-Generated)
HighLights
शनिवार का दिन बेहद खास माना गया है
इस दिन शनि देव की पूजा होती है
इस दिन हनुमान जी की पूजा का भी विधान है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी कलयुग के जागृत देवता हैं। उनकी भक्ति न केवल मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि जीवन के बड़े से बड़े संकटों को भी हर लेती है। शनिवार के दिन बजरंगबली की पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि शनि देव ने हनुमान जी को वचन दिया था कि जो भी उनकी भक्ति करेगा, उसे शनि देव की कुदृष्टि का सामना कभी नहीं करना पड़ेगा।
शनिवार के दिन हनुमान चालीसा का 7 बार पाठ (सप्त पाठ) करना एक बहुत शक्तिशाली अनुष्ठान माना जाता है। लेकिन, इसके पूर्ण फल की प्राप्ति तभी होती है, जब इसे सही विधि के साथ किया जाए। आइए इस आर्टिकल में इसकी सही विधि जानते हैं।
7 बार पाठ करने का महत्व
हनुमान चालीसा की एक चौपाई है कि 'जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई'।। इसका इसका मतलब है कि जो व्यक्ति सौ बार इसका पाठ करता है, वह हर तरह के संकटों से मुक्त हो जाता है, लेकिन जो साधक सौ बार पाठ करने में असमर्थ हैं, वे इसका पाठ 7 बार भी कर सकते हैं। इसके अलावा शनिवार को 7 बार पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और कुंडली के अन्य दोषों का प्रभाव भी कम हो जाता है।
पाठ करने के गुप्त और जरूरी नियम
- शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ या तो सूर्योदय के समय करें या फिर सूर्यास्त के बाद। संध्या काल में किया गया पाठ शनि दोष शांति के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
- पाठ के लिए लाल रंग के आसन का प्रयोग करें।
- पाठ के दौरान मुख पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।
- पाठ शुरू करने से पहले चमेली के तेल का एक दीपक जलाएं। अगर चमेली का तेल न हो, तो शुद्ध घी या सरसों के तेल का दीपक भी जलाया जा सकता है।
- पाठ शुरू करने से पहले हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि आप 7 बार पाठ करेंगे।
- इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक विचार रखें।
- हनुमान जी को गुड़ और चने या बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं।
- अंत में भावपूर्ण आरती करें।
- पाठ पूर्ण होने के बाद प्रसाद को ग्रहण करें और दूसरों में भी जरूर बांटें।
।।हनुमान चालीसा।। (Hanuman Chalisa Ka Path)
।। दोहा।।
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
खबरें और भी
बरनउं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ।।
बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ।।
।। चौपाई ।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुं लोक उजागर ।।
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुण्डल कुंचित केसा ।।
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै । कांधे मूंज जनेउ साजै ।।
शंकर स्वयं/सुवन केसरी नंदन । तेज प्रताप महा जगवंदन ।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ।।
भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचन्द्र के काज संवारे ।।
लाय सजीवन लखन जियाए । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते । कबि कोबिद कहि सके कहां ते ।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना । राम मिलाय राज पद दीह्ना ।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ।।
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।।
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ।।
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तै कांपै ।।
भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै ।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ।।
संकट तै हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।।
सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ।।
और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ।।
चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।।
सनातन शास्त्रों में हनुमान पूजा का विशेष उल्लेख देखने को मिलता है।
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई । जहां जन्म हरिभक्त कहाई ।।
और देवता चित्त ना धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ।।
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।
जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ।।
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मह डेरा ।।
।। दोहा ।।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।
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