आत्मा मरती नहीं, बस शरीर बदलती है: भगवद्गीता के इस श्लोक से समझें मौत के बाद चेतना का क्या होता है
आत्मा को अजर-अमर और अविनाशी मानने की भारतीय पौराणिक-शाश्वत मान्यता को अब पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक भी अपने शोधों के आधार पर सही मानने लगे हैं। हाल मे ...और पढ़ें

मौत के बाद कहां जाती है आत्मा? (AI-Generated Image)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में हजारों साल पहले ही शरीर की काया में विद्यमान आत्मा को अजर-अमर माना गया है। महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिए उपदेश में आत्मा को कभी नष्ट नहीं होने वाला बीज-तत्व माना है।
अब इसी सनातन मान्यता को वैज्ञानिक समर्थन मिला है। भौतिकी और गणित के दो वैज्ञानिकों ने लंबे शोध के बाद निष्कर्ष निकाला है कि आत्मा मरती नहीं है, मात्र शरीर मरता है। मृत्यु के बाद आत्मा ब्रह्मांड में विचरण करने लगती है। इसमें अंतर्निहित स्मृति या सूचनाएं भी नष्ट नहीं होती हैं।
वैज्ञानिकों के निष्कर्ष
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो मानव-मस्तिष्क एक जैविक कंप्यूटर की तरह है। इस जैविक संगणक की पृष्ठभूमि में प्रोग्रामिंग आत्मा या चेतना है, जो दिमाग के भीतर उपलब्ध एक कणीय (क्वांटम) कंप्यूटर के माध्यम से संचालित होती है। क्वांटम कंप्यूटर से तात्पर्य मस्तिष्क कोशिकाओं में स्थित उन सूक्ष्म नलिकाओं से है, जो प्रोटीन आधारित अणुओं से निर्मित हैं। बड़ी संख्या में ऊर्जा के सूक्ष्म स्रोत-अणु मिलकर एक क्वाटंम क्षेत्र तैयार करते हैं, जिसका वास्तविक रूप चेतना या आत्मा है।
इन वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि जब व्यक्ति दिमागी रूप में मृत्यु को प्राप्त होने लगता है, तब ये सूक्ष्म नलिकाएं क्वांटम क्षेत्र खोने लगती हैं। परिणामतः सूक्ष्म ऊर्जा कण मस्तिष्क की नलिकाओं से निकलकर ब्रह्मांड में चले जाते हैं। जब कभी मरता इंसान अचानक जी उठता है, तब ये कण वापस सूक्ष्म नलिकाओं में लौट आते हैं।
अनंतकाल से विद्यमान है आत्मा
वैज्ञानिकों का यह शोध भौतिक शास्त्र के क्वांटम सिद्धांत पर आधारित है। इसके अनुसार आत्मा, चेतन दिमाग की कोशिकाओं में प्रोटीन से बनी सूक्ष्म नलिकाओं में (माइक्रो ट्यूबुल्स) में ऊर्जा के सूक्ष्म स्रोत अणुओं और उप-अणुओं के रूप में रहती है। अर्जित ज्ञान भी इन्हीं सूक्ष्म कणों में संग्रहित रहता है। सूक्ष्म ऊर्जा कणों के ब्रह्मांड में जाने के बावजूद उनमें दर्ज सूचनाएं नष्ट नहीं होती हैं। सूक्ष्म नलिकाओं पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप मनुष्य को चैतन्यता का अनुभव होता रहता है।
दरअसल, हमारी आत्मा मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) के बीच बनने वाले संबंध से कहीं ज्यादा व्यापक है। असल में आत्मा का निर्माण उन्हीं तंतुओं या तत्वों से हुआ है, जिनमें सक्रियता और समन्वय के पश्चात ब्रह्मांड अस्तित्व में आया था। इसीलिए भारतीय दर्शन में उल्लेख है कि आत्मा, काल के जन्म से ही ब्रह्मांड में व्याप्त है। वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को ‘आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिएक्शन’ नाम दिया है।
आत्मा से मृत्यु का संबंध
आत्मा से मृत्यु के संबंध के बारे में हामरॉफ कहते हैं कि ‘मृत्यु जैसे अनुभव में सूक्ष्म नलिकाएं अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देती हैं, किंतु इसके अंदर के अनुभव क्षीण नहीं होते हैं। इसलिए आत्मा केवल शरीर छोड़कर ब्रह्मांड में विलय हो जाती है। इस अवस्था में कई बार कोई व्यक्ति, मृत्यु को प्राप्त हो जाने के पश्चात भी जीवित हो जाता है, तो इसका कारण यह होता है कि सूक्ष्म नलिकाएं क्वांटम अवस्था को पुनः प्राप्त हो जाती हैं। जीवन और मृत्यु के बीच व्यक्ति के साथ जो घटता है, वह मृत्यु का मात्र अनुभव होता है।’
मृत्यु के बाद क्वांटम सूचनाएं शरीर के आस-पास कुछ समय तक मंडराती रहती हैं, इन्हें पूरी तरह नष्ट करने के लिए ही हिंदुओं में अंतिम संस्कार के समय कपाल-क्रिया करने का प्रावधान है। म्यूनिख के प्लंक इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक हेंस पीटर ने भी आत्मा की अमरता पर किए इस शोध से सहमति जताई है।
अमर आत्मा की संकल्पना
अब जरा आत्मा के संबंध में गीता में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया उपदेश समझते हैं। आत्मा की अमरता का सार-तत्व इन दो श्लोकों में अंतर्निहित है-
वासांसि जीर्णानी यथा विहाय, नवानि गृहणति नरोःपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
अर्थात- मनुष्य जैसे पुराने कपड़ों को छोड़कर दूसरे नए कपड़े पहन लेता है, ऐसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर में प्रवेश कर जाती है।
नैनं छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयंत्यापो न शोषयति मारुतः।।
अर्थात- आत्मा के अस्तित्व को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती। जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती है। आत्मा की अमरता का यह विज्ञान सम्मत शोध हमारे ऋषियों ने 5 हजार साल पहले कैसे किया, यह भी एक अनुसंधान का विषय है।
हालांकि, भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से मानता है कि जीवात्मा रूपी ईश्वरीय अंश सभी जीवों में एक समान रूप से विद्यमान है। आत्मा या जीवात्मा का न कोई रंग है, न रूप है। आत्मा के संदर्भ में आश्चर्य यह भी है कि आत्मा जिस भी जीव में उपलब्ध है, उसे भी न यह दिखती है और न वह इसका अंग के रूप में अनुभव करता है। किसी अन्य को भी यह नहीं दिखती है। इसीलिए, भारतीय चिंतन में उल्लेख है कि जो जीवात्मा है, वह अनेक स्तरों के माध्यम से शरीर से लिपटी हुई है।
मृत्यु के बाद भी है जीवन
भगवत गीता में दर्ज आत्मा की अमरता के जिस दर्शन को हम नकारने की भरसक कोशिश में लगे रहते हैं, उसकी सच्चाई अब सामने है। आत्मा अमर है तो पुनर्जन्म भी स्वाभाविक है। शताब्दियों से इंसान इसी शाश्वत समस्या के सत्य को जानने की कोशिश में लगा है कि मृत्यु होने के बाद क्या होता है? मृत्यु के बाद नए जीवन के रूप में पुनर्जन्म होता है या सबकुछ शून्य में बदल जाता है? इस विषयक डॉ. रेमंड ए. मूडी की किताब हैं, ‘लाइफ ऑफ्टर लाइफ’। इसका हिंदी अनुवाद ‘जीवन के बाद जीवन’ शीर्षक से आया है। मूडी ने सौ से अधिक ऐसे लोगों से चर्चा की है, जो मृत्यु को प्राप्त होने के कुछ समय बाद एकाएक जी उठे। इस बातचीत से निष्कर्ष निकला कि इंसान का जीवन मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होता।
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