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    महादेव नहीं, तो फिर किस देवता के लिए दक्षिण भारत में उठती है कांवड़? सच जानेंगे तो हैरान रह जाएंगे

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 05:30 PM (IST)

    उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में भी कांवड़ यात्रा निकाली जाती है, जिसे 'कावडी' या 'क्षत्रिस' कहते हैं। यह यात्रा थाईपुसम त्योहार के दौरान भगवान कार्त ...और पढ़ें

    उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में भी निकाली जाती है कांवड़ यात्रा

    उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में भी निकाली जाती है कांवड़ यात्रा

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल सावन के पवित्र महीने में उत्तर भारत के राज्य में कांवड़ यात्रा निकाली जाती है। जिसमें शिव भक्त दूर स्थानों से नदियों का जल भरकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं।

    उत्तर भारत में इस पारंपरिक यात्रा को कांवड़ यात्रा के नाम से जाना जाता है, जिसमें बांस से बनी बंहगी के दोनों सिरों पर पानी से भरा मटका या कलश लटकाकर लाया जाता है, जिसे कांवड़ कहते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि, उत्तर भारत की ही तरह दक्षिण भारत में भी ऐसी ही एक यात्रा निकाली जाती है।

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    (Picture Credits- Facebook)

    दक्षिण भारत की कांवड़ उत्तर भारत से कैसे अलग?

    दक्षिण भारत में निकाली जाने वाली कांवड़ यात्रा उत्तर भारत की कांवड़ यात्रा से बिल्कुल अलग होती है। इसमें भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन देवता के रूप में पूजा जाता है, उनसे जुड़े त्योहार थाईपुसम में भक्त बड़ी संख्या में कावड़ की ही तरह कावडी जिसे स्थानीय भाषा में क्षत्रिस भी कहते हैं, अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं। 

    उत्तर भारत में जहां कांवड़ों पर पानी से भरे मटके लटके होते हैं, वहीं दक्षिण भारत के कांवड़ को मोर पंखों, फूलों और कई तरह की सजावटी चीजों से सजाया जाता है और इसमें पानी के मटके भी नहीं होते हैं।

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    (Picture Credits- Instagram

    थाईपुसम त्योहार के दौरान निकाली जाती है कांवड़ यात्रा

    दक्षिण भारत के हजारों भक्त हर साल जनवरी-फरवरी महीने के आसपास पवित्र थाईपुसम त्योहार मनाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु कंधो पर कांवड़ की ही तरह क्षत्रिस उठाकर चलते, नाचते-गाते और 'वेल वेल शक्ति का वेल' मंत्र का जाप करते हुए पलानी मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वहीं कुछ भक्त इस उत्सव के दौरान कांवड़ के रूप में दूध का एक पात्र सिर पर उठाकर चलते हैं।

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    दक्षिण भारत में थाईपुसम उत्सव भगवान कार्तिकेय के ही मुरुगन रूप को समर्पित है। इस उत्सव में सबसे मुश्किल तपस्या वाल कांवड़ है। दरअसल वाल कांवड़ करीब 2 मीटर लंबा और मोर पंख से सजा होता है। यह कांवड़ भक्तों के शरीर से जुड़ा होता है।

    थाईपुसम के दौरान भक्त भगवान की भक्ति में इस कदर लीन होते हैं कि, उन्हें किसी भी तरह के दर्द का एहसास भी नहीं होता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि, इस वाल कांवड़ में न हीं खून निकलता है और न ही बाद में शरीर पर किसी भी तरह के निशान दिखाई देते हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।