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पूजा के दौरान परिक्रमा क्यों की जाती है? पढ़ें इसका धार्मिक महत्व और वैज्ञानिक कारण

Updated: Sat, 15 Aug 2026 01:36 PM (IST)

हिंदू धर्म में परिक्रमा का अत्यंत महत्व है, जिसे पूजा की पूर्णता और भगवान को केंद्र में रखने का प्रतीक माना जाता है। यह शरीर, मन और जीवन के लिए एक चलता-फिरता मंत्र है, जो अहंकार को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

मंदिर में प्रदक्षिणा क्यों लगाई जाती है? (Picture Credits- AI Image)

मंदिर में प्रदक्षिणा क्यों लगाई जाती है? (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में परिक्रमा का अत्यंत महत्व है। हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोग खासतौर पर मंदिरों में पूजा-पाठ करने के दौरान प्रदक्षिणा जिसे परिक्रमा भी कहा जाता है, करते हैं। माना जाता है कि, परिक्रमा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।

हिंदू बिना किसी वजह के चक्कर नहीं लगाते। प्रदक्षिणा कोई अंधाधुंध पूजा-पाठ नहीं है। यह आपके शरीर, मन और जीवन के लिए एक चलता-फिरता मंत्र है।

प्रदक्षिणा में 'प्र' का अर्थ- ठीक प्रकार से
'दक्षिणा' का अर्थ- दाहिनी ओर

जिसका पूरा अर्थ बनता है पवित्र चीज की ओर दाहिनी ओर से जाना। जब हम मंदिर के चारों ओर घूमते हैं तो इसका अर्थ है कि, हम अपने शरीर से कह रहे हैं कि, भगवान केंद्र में हैं। मैं उनके चारों ओर घूमता हू्ं, न कि दूसरी तरफ। जहां अहंकार कहता है कि, 'मैं केंद्र हूं' वहीं प्रदक्षिणा कहती है कि, 'धर्म केंद्र है।'

शास्त्रों में दाहिना हिस्सा शुभ और मंगलकारी माना जाता है। किसी चीज को सही जगह पर रखना उसका सम्मान करना है।

प्रदक्षिणा किस बात का प्रतीक

प्रदक्षिणा का प्रत्येक कदम इस बात का प्रतीक है कि, 'मेरी सोच, मेरी योजनाएं, सच्चाई, करुणा और धर्म के इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए, न कि सिर्फ मेरी छोटी-मोटी पसंद और नापसंद के चारों ओर।'

प्रदक्षिणा के पीछे एक बारीक विज्ञान छिपा होता है। हाथ जोड़कर और सांस को स्थिर रखते हुए घड़ी की सुई की दिशा में धीरे-धीरे चलने से नर्वस सिस्टम शांत होता है। इससे मन शांत, दिल नरम और ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है।

हिंदू धर्म में मनुष्य एक मंदिर में देवता, तुलसी, पीपल का पेड़, गुरु और शादी में आग की ओर प्रदक्षिणा लगाते हैं। प्रदक्षिणा हर मामले में पवित्र मानी जाती है।

जीवन को भी एक बड़े प्रदक्षिणा के रूप में देखा जा सकता है। हम जन्म लेते हैं, कई भूमिकाओं में आगे बढ़ते हैं, लेकिन केंद्र में ईश्वर, सच्चाई और धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए।

प्रदक्षिणा का असल उद्देश्य

प्रदक्षिणा का मतलब असल मायनों में बिना उद्देश्य के घूमना नहीं है, बल्कि इसका असल उद्देश्य भगवान को केंद्र में रखना है। अहंकार को धर्म के अनुसार चलने के लिए तैयार करना है। शरीर, सांस और मन को उस चीज से जोड़ना है, जो सच में काफी पवित्र मानी जाती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।