अगर हर काम 'कल' पर टालते हो, तो भीष्म पितामह की यह कहानी तुम्हारा पूरा माइंडसेट बदल देगी!
महाभारत के शांति पर्व से भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई तीन मछलियों की कहानी आलस्य और टालमटोल से बचने का संदेश देती है। ...और पढ़ें

भीष्म पितामह की तीन मछलियों से जुड़ी कथा (AI-Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ऐसे लोग जिन्में हर काम को टालने की आदत होती है और आलस भरा जीवन जीते हैं, उन्हें महाभारत के शांति पर्व अध्याय से जुड़ी यह कहानी पढ़नी चाहिए, जो युधिष्ठिर को भीष्म पितामह ने सुनाई थी।
हम सभी को पता है कि, महाभारत की कहानी पांडवों और कौरवों के बीच हुए भीषण युद्ध पर आधारित है, लेकिन इस महाकाव्य में सांसारिक ज्ञान के रूप में भी काफी कुछ समाहित है, जो महाकाव्यों से जुड़े पात्रों के बीच बातचीत में छिपा है।
महाभारत में युद्ध खत्म होने के बाद भगवान कृष्ण ने पांडवों में सबसे बड़े राजकुमार युधिष्ठिर को राजधर्म से जुड़ी शिक्षा लेने के लिए भीष्म पितामह से मिलने की सलाह दी। भीष्म पितामह कुरुक्षेत्र के मैदान में बाणों की शय्या पर लेटे हुए अपनी मौत का इंतजार कर रहे थे। श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर भीष्म पितामह से मिलने गए।

राजधर्म से जुड़ी कहानी
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से बातचीत के दौरान राजधर्म के ज्ञान को समझाने के लिए अनेक कहानियां सुनाईं। इनमें से एक कहानी तीन मछलियों पर आधारित थी, जिनकी झलक पंचतंत्र में भी देखने को मिलती है।
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भीष्म पितामह ने कहानी सुनाते हुए कहा कि, एक तालाब में तीन मछलियां रहती थी। पहली मछली का नाम अनागतविधाता, जो सबसे बुद्धिमानी थीं, क्योंकि वो हर आने वाले खतरे को पहले ही भांप लेते थी। दूसरी मछली का नाम, प्रत्युन्मति था, जो मानती थी कि, अपने आप परिस्थिति आने पर बुद्धि से रास्ता निकल लेगी और तीसरी मछली थी दीर्घसूत्री जो स्वभाव में काफी आलसी और हर काम को बाद में टालने वाली थी।
एक बार मछुआरों ने योजना बनाई कि, वह तालाब का सारा पानी निकाल देंगे और मछलियों को पकड़ लेंगे। अनागतविधाता ने मछुआरे की यह सभी बातें सुन लीं। उसे लगा कि, अब तालाब में खतरा है, तो उसने यह बात अपने मित्रों को बताई। उसने कहा कि, मछुआरे तालाब का पानी कम करके सभी मछलियों को जाल से पकड़ लेंगे, इसलिए हमें तैरकर दूसरे तालाब में जल्दी से चले जाना चाहिए।
अनागतविधाता की इस बात को सुनकर प्रत्युन्मति ने कहा कि, मैं तुम्हारी बातों से सहमत हूं, लेकिन मुझे लगता है कि, तुम जल्दबाजी में फैसला ले रही हो। पहले यहां रुकते हैं, देख लेते हैं अगर संकट आया तो निकल जाएंगे समय रहते और दीर्घसूत्री ने तो अनागतविधाता की बातों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।
वह बोली कि, तुम जल्दी ही डर जाती हो, संकट जब आएगा तब देख लेंगे। अगले दिन बिना समय गावएं अनागतविधाता तैरकर दूसरे तालाब में चली गई। जैसे ही पानी कम हुआ, मछुआरों ने पानी में जाल डाला और दीर्घसूत्री पकड़ में आ गई, लेकिन प्रत्युन्मति फौरन परिस्थितियों को भांपकर अगले तालाब में चली गई।
सही समय पर सही निर्णय लेने जरूरी
तब भीष्म पितामह युधिष्ठिर को कहते हैं कि, जो व्यक्ति मुसीबत आने पर भी अंहकार, आलस्य और चीजों को टालने में रहता है, उसका हाल दीर्घसूत्री की ही तरह होता है। जो सिर्फ अपनी चालाकी पर अंहकार करता है वह कभी-कभी तो बच जाता है, लेकिन हमेशा सुरक्षित नहीं रहता है, जैसे प्रत्युन्मति के साथ हुआ लेकिन जो संकट आने से पहले ही सही निर्णय लेता है, वह हमेशा सुरक्षित रहता है। जैसे अनागतविधाता के साथ हुआ।
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