वट सावित्री व्रत में महिलाएं बांस से बने पंखे क्यों खरीदती हैं? जानिए आध्यात्मिक महत्व और परंपरा
वट सावित्री का पर्व 16 मई 2026 शनिवार के दिन पड़ रहा है. इस व्रत में महिलाएं आखिर बांस से बने 2 पंखे क्यों खरीदती हैं? ...और पढ़ें

वट सावित्री पर बांस के पंखे का महत्व (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इस व्रत का संबंध पतिव्रता कही जाने वाली सावित्री और सत्यवान से है। प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि पर वट सावित्री का पर्व मनाया जाता है, जोकि इस साल 16 मई 2026 शनिवार के दिन है।
वट सावित्री व्रत के मौके पर बिहार, उत्तर-प्रदेश और राजस्थान की महिलाएं बांस से बने 2 पंखे (बेना) खरीदती हैं। आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और पौराणिक क्या है?
वट सावित्री व्रत में 2 पंखे खरीदने की परंपरा
पौराणिक कथा के मुताबिक, जब सावित्री अपने पति के प्राणों की रक्षा करने के लिए यमराज के पीछे जा रही थीं, तब सत्यवान का शरीर निडाल पड़ चुका था।
ज्येष्ठ माह की प्रचंड गर्मी पड़ने के कारण सावित्री ने बांस के बने पंखे से अपने पति को हवा की थी, ताकि उन्हें शीतलता मिले। इसी परंपरा को निभाते हुए महिलाएं पंखा खरीदती हैं और पूजा के समय बरगद के पेड़ और यमराज को पंखा झलती हैं।

ज्येष्ठ माह में दान का महत्व
ज्येष्ठ माह में चिलचिलाती गर्मी पड़ने के कारण पंखा दान करना महादान माना गया है। पूजा होने के बाद महिलाएं यह पंखा ब्राह्माणों को दान करती हैं। माना जाता है कि, ऐसा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है।
वट सावित्री व्रत के दिन खासतौर पर बांस से बने पंखे का ही इस्तेमाल किया जाता है। हिंदू धर्म में बांस को वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाना है, इसलिए आमतौर पर कई हिंदू बांस को जलाने से बचते हैं।
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इस परंपरा का व्यावहारिक कारण
यह पर्व ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को पड़ता है, जो साल के सबसे गर्म दिनों में से एक होता है। पुराने समय में जब बिजली के पंखे नहीं थे, तब गर्मी से राहत पाने का एकमात्र साधन था हाथ से बना पंखा। इसी वजह से वट सावित्री वाले दिन पूजा की सामग्री में इसके अनिवार्य रूप में शामिल किया जाता है।
कुल मिलाकर इसका व्यावहारिक कारण यह है कि, पंखा खरीदना और उससे हवा करना पति के लिए समर्पण, प्रेम और सेवा भाव को दर्शाता है।
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