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    शुकदेव मुनि और काकभुशुण्डि: कौन थे ये महान ज्ञानी और क्या है इनकी कहानी?

    Updated: Tue, 14 Jul 2026 09:00 AM (IST)

    शुकदेव मुनि और काकभुशुण्डि पौराणिक कथाओं के दो महान ज्ञानी थे, जिन्होंने काल की सीमाओं को लांघकर अमरता प्राप्त की। शुकदेव वैराग्य और ज्ञान योग के प्रत ...और पढ़ें

    शुकदेव मुनि और काकभुशुण्डि की कहानी (Image Credit- AI)

    शुकदेव मुनि और काकभुशुण्डि की कहानी (Image Credit- AI)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पौराणिक कथाओं में कई सारी ऐसी चीजों का वर्णन किया गया है, जिसके बारे में हम सभी ने कई बार नहीं पढ़ा होगा। शुकदेव मुनि और काकभुशुण्डि इनमें से एक हैं। ये दोनों ही महान ज्ञानी ऋषि थे। इन्होंने काल की सभी सीमाओं को लांघकर अमरता और असीम ज्ञान को प्राप्त किया था। इन दोनों ऋषियों की कहानी में बहुत अंतर है, जिसके बारे में आपको विस्तार से आर्टिकल में बताते हैं।

    शुकदेव मुनि कौन हैं?

    शुकदेव मुनि भगवान वेदव्यास के पुत्र थे, जो जन्म के बाद ही संसार के मोह को त्यागकर जंगल में चले गए थे। इसलिए उनका पूरा जीवन वैराग्य को दर्शाता है। इनका जन्म सामान्य नहीं था। वे स्वयंभू जन्मे थे। वह जन्म से ही ज्ञानी थे। शुकदेव मुनि का सबसे बड़ा कार्य राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण का उपदेश देना था। उन्होंने सात दिनों में परीक्षित को वह ज्ञान दिया, जिससे उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ। इनके ज्ञान का उल्लेख महाभारत में भी पढ़ने को मिलता है।

    काकभुशुण्डि काल को जीतने वाला कौआ

    काकभुशुण्डि का चरित्र अत्यंत अद्भुत है। वे एक ऐसे भक्त थे जिन्होंने भगवान राम की भक्ति के कारण अमरत्व प्राप्त किया। काकभुशुण्डि अपने पूर्व जन्म में एक साधारण व्यक्ति थे, जो शिव के सेवक कहे जाते हैं। वे अत्यंत क्रोधी और घमंडी थे। इसी कारण से उन्हें लोमश ऋषि द्वारा श्राप दिया गया और उन्हें कौए का शरीर मिला, लेकिन भगवान शिव की आराधना करने से उन्हें भगवान राम की भक्ति करने का वरदान प्राप्त हुआ।

    काकभुशुण्डि के पास एक ऐसी शक्ति थी कि वो सृष्टि के विनाश और पुननिर्माण को देख लिया करते थे। काकभुशुण्डि की सबसे प्रसिद्ध कथा गोस्वामी तुलसीदास कृत 'श्रीरामचरितमानस' के उत्तरकांड में मिलती है।

    इन महान ज्ञानियों में क्या समानता है?

    शुकदेव मुनि और काकभुशुण्डि, दोनों ही काल के प्रभाव से परे हैं। शुकदेव मुनि जहां ज्ञान योग और वैराग्य के प्रतीक हैं, वहीं काकभुशुण्डि भक्ति का साक्षात प्रमाण हैं। ये दोनों ही हमें बताते हैं कि भगवान का ज्ञान किसी एक मार्ग से नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण से प्राप्त होता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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