श्मशान घाट पहुंचने से पहले क्यों दिया जाता है अर्थी को विश्राम? गरुड़ पुराण में छिपा है इस परंपरा का असली रहस्य
श्मशान घाट पहुंचने से पहले अर्थी को विश्राम देने का गहरा अर्थ है, जो आत्मा को संसार से विदा लेने का अंतिम अवसर देता है। ...और पढ़ें

श्मशान की यात्रा अंतिम यात्रा होती है। (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
आत्मा को संसार से विदा लेने का अंतिम अवसर।
दिशा बदलने से मृतक मोहमाया छोड़कर आगे बढ़ता है।
पीपल की छांव में देवताओं का आशीर्वाद मिलता है, यात्रा सरल।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। किसी व्यक्ति के जीवन की अंतिम यात्रा कैसी होती होगी? क्या मरा हुआ व्यक्ति अपनी अंतिम यात्रा देख सकता है? इस संसार और अपनों को छोड़कर जाने में उसे कितना कष्ट हो रहा होगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में अंतिम संस्कार से जुड़े अध्यायों, मुख्यतः 10वें अध्याय में वर्णित है। इस अध्याय में बताया गया है कि अपने शरीर, इस संसार और अपने परिवार को छोड़ना एक आत्मा के लिए बहुत ही दुखद होता है।
इसलिए अंतिम संस्कार से पहले मृतक को पूरा मौका दिया जाता है कि वह एक बार इस संसार को आखिरी बार देख ले, क्योंकि अब उसकी यहां यात्रा पूरी हो चुकी है। गरुड़ पुराण में इस बात को विस्तार से बताया गया है कि क्यों श्मशान घाट ले जाने से पहले अर्थी को कुछ देर के लिए जमीन पर रख दिया जाता है।
अर्थी को विश्राम देने का क्या होता है अर्थ?
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार से जुड़े बहुत सारे नियम हैं। इन नियमों में से एक यह भी है कि मृतक की अर्थी को सजाकर जब श्मशान ले जाया जाता है, तो बस श्मशान से कुछ दूर पहले उसकी अर्थी को जमीन पर रखकर विश्राम दिया जाता है। उस वक्त मृतक का सिर आगे और पैर पीछे की ओर होते हैं। इसका अर्थ गरुड़ पुराण में यह बताया गया है कि घर से अर्थी ले जाते वक्त मृतक को यह दिखाया जाता है कि देखो तुम अपने पीछे क्या-क्या छोड़कर जा रहे हो।
अर्थी को कुछ मिनटों का विश्राम देने के बाद अर्थी की दिशा बदल दी जाती है और तब मृतक के पैर आगे और सिर पीछे होते है। इसका अर्थ होता है कि अब मृतक को सभी मोहमाया को पीछे छोड़कर अपनी अंतिम यात्रा पूरी करनी है। यह यात्रा श्मशान की होती है। इसलिए उसका मुंह भी श्मशान की ओर मोड़ दिया जाता है।
खबरें और भी
अर्थी को पीपल की छांव में रखने का क्या महत्व है?
अर्थी को जब विश्राम दिया जाता है, तो इसके लिए पीपल के पेड़ की छांव देखी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पीपल के पेड़ में सभी देवी-देवता वास करते हैं। वे सभी मृतक को इस संसार को छोड़कर आगे बढ़ने का आशीर्वाद देते हैं, ताकि उसकी आगे की यात्रा थोड़ी सरल हो जाए।
अतः गरुड़ पुराण की मानें तो मृतक की अर्थी के साथ ऐसा करना उसे आखिरी मौका देना होता है कि वह पीछे मुड़कर सभी को अलविदा कह ले।
यह भी पढ़ें- अंतिम संस्कार के बाद घर में क्यों लगाई जाती है तुलसी? पढ़ें इसके पीछे का गहरा आध्यात्मिक कारण
यह भी पढ़ें- अंतिम संस्कार से लौटने के बाद घर के शुद्धिकरण के लिए क्या करना चाहिए?
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।