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    पूरी लंका जलकर राख हो गई, लेकिन रावण का महल क्यों बच गया? हनुमान जी की 'चतुराई' का रहस्य

    Updated: Mon, 20 Apr 2026 02:03 PM (IST)

    आखिर क्यों हनुमान जी ने लंका दहन के समय पूरी स्वर्ण नगरी जला दी, लेकिन रावण का मुख्य महल सुरक्षित रहा? जानें रामायण का यह गहरा रहस्य। ...और पढ़ें

    रामायण का सबसे बड़ा रहस्य  (Image Source: AI-Generated)

    रामायण का सबसे बड़ा रहस्य (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण की कहानियां हमें न सिर्फ धर्म और अधर्म का फर्क समझाती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि अपार शक्ति होने के बावजूद समझदारी और मर्यादा का पालन कैसे किया जाता है। लंका दहन का प्रसंग तो हम सबने सुना है, जब बजरंगबली ने अपनी पूंछ की आग से पूरी स्वर्ण नगरी को राख के ढेर में बदल दिया था। लेकिन, एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि जिस हनुमान जी ने पूरी लंका जला दी, उन्होंने रावण के मुख्य महल को क्यों नहीं छुआ?

    यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे हनुमान जी की गहरी कूटनीति, भक्ति और उनके संस्कार छिपे थे। आइए, इस रहस्य को आसान शब्दों में समझते हैं।

    भक्त विभीषण का सम्मान

    जब हनुमान जी लंका को अपनी पूंछ से जला रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक स्थान ऐसा है जहां 'हरि' नाम का जप हो रहा है और भवन पर शंख, चक्र और गदा के चिह्न बने हुए हैं। वह घर रावण के भाई विभीषण का था। हनुमान जी जानते थे कि विभीषण एक सच्चे राम भक्त हैं।

    शास्त्रों के अनुसार, जहां भगवान का भक्त रहता है, वह स्थान मंदिर के समान पवित्र होता है। चूंकि, विभीषण का घर राजमहल परिसर के बहुत पास था, इसलिए हनुमान जी ने उस पूरे हिस्से की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा।

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    (Image Source: AI-Gene)

    माता सीता की सुरक्षा का संकल्प

    हनुमान जी का मुख्य उद्देश्य माता सीता की खोज करना और उन्हें सुरक्षित रखना था। रावण का मुख्य महल और अशोक वाटिका (जहां माता सीता थीं) एक-दूसरे से सटे हुए थे। हनुमान जी को लगा कि अगर वह मुख्य महल में भीषण आग लगाते हैं, तो उसकी लपटें और ताप अशोक वाटिका तक पहुंच सकते हैं, जिससे माता सीता को कष्ट हो सकता था। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने उस हिस्से को अग्नि के हवाले नहीं किया।

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    शिव और शक्ति का नाता

    एक पौराणिक मान्यता यह भी है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसने अपनी तपस्या से महादेव को प्रसन्न कर लंका का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि उस महल में स्वयं महादेव का वास था। हनुमान जी, जो स्वयं शिव के रुद्रावतार (अंशावतार) हैं, भला अपने ही आराध्य के निवास स्थान को कैसे जला सकते थे? उन्होंने केवल उस 'अहंकार' को जलाया जिसने मर्यादा लांघी थी, उस स्थान को नहीं जहां शिव का वास था।

    रावण को एक बड़ी चेतावनी

    हनुमान जी का मकसद लंका का पूरी तरह विनाश करना नहीं, बल्कि रावण के घमंड को तोड़ना था। उन्होंने पूरी लंका जलाकर यह संदेश दिया कि अगर राम का एक दूत इतना शक्तिशाली है, तो पूरी सेना क्या कर सकती है। महल को सुरक्षित छोड़ना रावण के लिए एक मनोवैज्ञानिक चोट थी, यह बताने के लिए कि तुम्हारी रक्षा करने वाला कोई नहीं बचेगा, और तुम इस खाली महल में अपनी हार देखने के लिए अकेले रह जाओगे।

    कहां मिलता है इसका वर्णन?

    इन प्रसंगों का आधार वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड और गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस जैसी पवित्र पुस्तकों में मिलता है, जहां हनुमान जी की बुद्धिमत्ता और उनकी भक्ति का विस्तार से वर्णन किया गया है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।