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उदया तिथि से मनाए जाते हैं सभी हिंदू पर्व, तो जन्माष्टमी की तिथि रात के मुहूर्त से क्यों तय होती है?

Published: Thu, 03 Sep 2026 11:15 AM (IST)

अधिकांश हिंदू पर्व उदया तिथि के आधार पर मनाए जाते हैं, लेकिन जन्माष्टमी की तिथि के लिए ऐसी बाध्यता नहीं ...और पढ़ें

उदया तिथि नहीं, निशिता काल से तय होती है जन्माष्टमी की तारीख, जानें कारण (Picture Credit: AI Generated)

उदया तिथि नहीं, निशिता काल से तय होती है जन्माष्टमी की तारीख, जानें कारण (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. अधिकांश हिंदू पर्व उदया तिथि के अनुसार मनाए जाते हैं।

  2. जन्माष्टमी की तिथि निशिता काल (आधी रात) से तय होती है।

  3. भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में हुआ।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में किसी भी तीज-त्योहार की सही तारीख का निर्धारण उदया तिथि के आधार पर होता है और इसी समय के अनुसार पर्व मनाया होता है। कई व्रत ऐसे होते हैं जो दो दिन तक पड़ते हैं ऐसे में वही तिथि मान्य होती है जिसमें वह पर्व उदया तिथि में पड़ रहा हो।

वहीं एक हिंदू पर्व ऐसा भी है जिसमें उदया तिथि की जगह रात की तिथि देखी जाती है और निशिता काल के अनुसार ही यह तय किया जाता है कि इस पर्व को किस दिन मनाना उचित होगा। यह पर्व है जन्माष्टमी का जिसे कभी भी उदया तिथि के अनुसार नहीं मना जाता है।

इस साल भी जन्माष्टमी दो दिन पड़ रही है, लेकिन 04 सितंबर को ही उदया तिथि मनाई जाएगी जबकि यदि उदया तिथि को मानें तो जन्माष्टमी 05 सितंबर को होनी चाहिए थी। आइए आपको बताते हैं कि जन्माष्टमी की तिथि निशिता काल से ही क्यों तय होती है?

हिंदू पर्व उदया तिथि में क्यों मनाए जाते हैं?

उदया तिथि का अर्थ है कि वह तिथि जो सूर्योदय के साथ शुरू होती है। इसका मतलब यह है कि जिस तिथि में सूर्योदय होता है उसे ही किसी पर्व को मनाने की तिथि कहा जाता है। कोई तिथि सूर्योदय के साथ प्रथम प्रहर में प्रारंभ होती है तो उसे उदया तिथि कहा जाता है।

मान लीजिए कि कोई तिथि किसी भी दिन दोपहर या शाम के समय आरंभ होकर अगले दिन की दोपहर या शाम तक है, तो इस पर्व को दूसरे दिन ही मनाया जाएगा, क्योंकि इसी दिन सूर्योदय के समय यह तिथि उपलब्ध होगी। हिंदू पंचांग के अनुसार कोई भी उदया तिथि की समयावधि 19 से 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती है। तिथियों का ये अंतराल सूर्य और चंद्रमा के अंतर से तय होता है और इसी आधार पर व्रत त्योहार निर्धारित होते हैं।

जन्माष्टमी का निर्धारण उदया तिथि से क्यों नहीं होता है?

हिंदू परंपरा के अनुसार, भगवान कृष्ण का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को, यानी 'निशिता काल' में हुआ था। इसीलिए जन्माष्टमी की तिथि हमेशा उसी के अनुसार तय होती है जब अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी मिल रहा हो। इसी तिथि में आधी रात को कान्हा का जन्मोत्सव मनाया जाता है जब यह तिथि अपने चरम पर होती है; मंदिर प्रार्थनाओं, भजनों और घंटियों की आवाज से गूंज उठते हैं और बाल गोपाल की झांकी सजाई जाती है।

इस साल कब मनाई जा रही है जन्माष्टमी?

किस रात होगा कान्हा का प्राकट्य और कौन सा समय माना जाएगा सबसे शुभ? इस बात को लेकर बहुत से लोगों के मन में भ्रम बना हुआ है।

सनातन परंपरा में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के पावन संयोग को भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य से जोड़ा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र तिथि पर पूर्ण निष्ठा, सात्विकता, नियम और वात्सल्य भाव से व्रत एवं जन्मोत्सव का पालन करने से भक्त को भगवान श्री कृष्ण की विशेष कृपा मिलती है और जीवन के अनेक कष्टों से मुक्ति मिलती है। प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि कृष्ण का जन्म भादो पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था जिसे निशिता काल माना जाता है। इस साल भादो की अष्टमी 03 सितंबर को देर रात 02 बजे हो रहा है और रोहिणी नक्षत्र के साथ अष्टमी तिथि 04 सितंबर की मध्य रात्रि में पड़ेगी, इसलिए 04 सितंबर को ही जन्माष्टमी मनाई जाएगी।

अगर आप भी जन्माष्टमी की पर्व धूम-धाम से मानते हैं तो यह जानकारी आपके काम आ सकती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।