लड्डू गोपाल के सीने पर क्यों है पैर का निशान? पढ़ें इस रहस्य से जुड़ी पौराणिक कथा
जन्माष्टमी पर बाल गोपाल की मूर्ति पर बने पैरों के निशान का रहस्य ऋषि भृगु और भगवान विष्णु से जुड़ा ...और पढ़ें

लड्डू गोपाल के सीने पर पैरों के निशान का रहस्य (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। 4 सितंबर 2026 को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के मुताबिक, भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। तब से लेकर आज तक यह तिथि भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने लगी।
भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण हैं। माना जाता है कि, जो भी भक्त जन्माष्टमी के मौके पर भगवान श्रीकृष्ण की सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसकी संपूर्ण मनोकामना पूरी होती है।
भारत वर्ष में श्रीकृष्ण को कई नामों से जाना जाता है, जैसे बाल गोपाल, बांके बिहारी, श्याम सुंदर, मुरारी, बंसीधार आदि। वही कान्हा के बाल स्वरूप को लड्डू गोपाल के रूप में पूजा जाता है। हम सभी ने बाल गोपाल की मूर्ति देखी होती है। आपने कभी गौर किया कि, लड्डू गोपाल की मूर्ति में उनके सीने पर पैरों के निशान बने हैं। आइए जानते हैं इन पैर के निशान का क्या रहस्य है?
लड्डू गोपाल के सीन पर पैर के निशान क्यों?
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, ऋषि मुनियों के बीच एक बार विवाद जन्मा कि सनातन धर्म के तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कौन सबसे महान है? तब ऋषि मुनियों ने यह पता करने के लिए ऋषियों में प्रमुख भृगु ऋषि को इस बात का पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई।
ऋषि भृगु सभी ऋषियों की सहमति पर सबसे पहले ब्रह्मा जी की परीक्षा लेने पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रह्मा जी से गुस्सा होकर कहा, 'मैं आपके यहां आया और आपने मेरा आदर सत्कार भी नहीं किया, यह मेरा अपमान है।' इस पर उलटे ही ब्रह्मा जी भृगु ऋषि पर नाराज होते हुए बोले, मैं तुम्हारा पिता हूं तुम अपने पिता से आदर सत्कार चाहते हो। भले ही तुम विद्वान क्यों न हो जाओ अपने से बड़ों का अपमान करने का हक तुम्हें नहीं है। तब ऋषि भृगु माफी मांगते हुए बोले, मैं तो बस यह देख रहा था कि आपको गुस्सा आता है या नहीं।
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भृगु ऋषि भगवान शिव के पास पहुंचे
इसके बाद भगवान शिव भृगु ऋषि कैलाश पर्वत पहुंचे और वहां भगवान शिव की परीक्षा लेना शुरू की। नंदी महाराज ने बताया कि, महादेव अभी समाधि में लीन हैं। लेकिन भृगु ऋषि नहीं मानें और समाधि में लीन भगवान शिव के पास पहुंचकर कहने लगे कि, हे महादेव आपके द्वार तो सदैव ऋषियों के लिए खुले रहते हैं फिर भी आपने मेरा स्वागत नहीं किया। भगवान शिव को यह सुनकर गुस्सा आ गया और उन्होंने ऋषि भृगु को मारने के लिए अपना त्रिशूल उठाया। मगर देवी पार्वती के हस्तक्षेप के बाद महादेव ने ऋषि भृगु को नहीं मारा।
श्रीहरि के पास पहुंचे महर्षि भृगु
दोनों स्थानों पर परीक्षा लेने के बाद आखिर में भृगु श्रीविष्णु के पास पहुंचे। श्री विष्णु निद्रा में थे। ऋषि भृगु को लगा कि, भगवान विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं और उन्होंने अपने पैर भगवान विष्णु की छाती पर रख दिया। गुस्सा होने के बजाय ऋषि भृगु को अलग प्रतिक्रिया देखने को मिली।
श्री विष्णु गुस्सा होने के बजाय भृगु ऋषि से पूछते हैं कि , 'कहीं आपके पैर में मेरी छाती से चोट तो नहीं पहुंची?' श्री हरि के इस व्यवहार से खुश होकर ऋषि भृगु ने उन्हें त्रिदेवों में सबसे श्रेष्ठ घोषित कर दिया। माना जाता है कि, तभी से लड्डू गोपाल की छति पर पैरों के चिह्न विराजित हैं। यह पैरों के चिह्न किसी और के नहीं, बल्कि ऋषि भृगु के हैं जिन्होंने उन्हें सतोगुणी देव की उपाधि दी थी।
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