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    शनिवार को ही क्यों खाया जाता है लिट्टी-चोखा? क्या है इसके पीछे का धार्मिक और ज्योतिषीय रहस्य

    Updated: Thu, 25 Jun 2026 06:00 PM (GMT+05:30)

    उत्तर भारत में शनिवार को लिट्टी चोखा या सत्तू खाने की परंपरा है, जिसका संबंध न्याय के देवता शनि देव और मन की शुद्धिकरण से है। ...और पढ़ें

    शनिवार को लिट्टी खाने की परंपरा क्यों निभाई जाती है? (Picture Credit- AI Generated)

    शनिवार को लिट्टी खाने की परंपरा क्यों निभाई जाती है? (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. शनिवार को लिट्टी चोखा खाने की पुरानी परंपरा।

    2. इसका संबंध शनि देव और मन की शुद्धिकरण से।

    3. आयुर्वेद, ज्योतिष और सात्विक जीवनशैली से जुड़ा।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर भारत के राज्य बिहार, झारखंड और पूर्वांचल में विशेष तौर पर शनिवार के दिन लिट्टी चोखा या फिर सत्तू से बने भोजन को खाने की परंपरा रही है। पहली नजर में लिट्टी चोखा क्षेत्रीय खान-पान से जुड़ा लग सकता है, लेकिन जब बात इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व की आती है, तो इसका संबंध न्याय के देवता शनि देव और मन को शुद्धिकरण करने से जोड़कर देखा जाता है।

    ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, शनिवार का दिन न्याय और कर्म प्रधान देवता शनिदेव को समर्पित है। शनि देव को सात्विक, पवित्र, शुद्ध, श्रम वाला काम, भूरी और खुरदरी वस्तुएं काफी प्रिय हैं।

    लिट्टी बनाने के लिए उसका मुख्य घटक सत्तू जो भूने हुए चने का आटा और जौ या गेहूं का आटा है। ज्योतिषी मान्यता यह है कि, चना और अनाज (खासकर भुना हुआ)राहु, केतु और शनि के कुप्रभावों से बचाने में मदद करता है।

    लिट्टी बनाने के लिए अग्नि तत्व की अहम भूमिका

    लिट्टी की लोई बनाने के बाद उसे सीधा कोयले, कंडे या आग पर सेंका जाता है। धार्मिक मान्यता कहती है कि, अग्नि शुद्धिकरण का प्रतीक मानी जाती है। शनिवार के दिन अग्नि पर पके हुए भोजन को सात्विक और पवित्र माना जाता है, जिसे खाने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    शनिवार का दिन शनि देव को समर्पित होने के कारण यह सादगी, अनुशासन और आत्म-मंथन से भरा दिन भी है। लिट्टी चोखा बेहद ही साधारण, बिना किसी तड़क-भड़क और कृत्रिम मसालों से तैयार होने वाला भोजन माना जाता है। यह तामसिक आदतों को दूर करने में मदद करता है।

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    धार्मिक मान्यता है कि, भगवान श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में ताड़का का वध किया था। उसके बाद उन्होंने बिहार के बक्सर के चरित्रवन में खुद अपने हाथों से लिट्टी-चोखा बनाकर ऋषियों को खाना खिलाया था। आज भी इस परंपरा को निभाते हुए वहां लोग लिट्टी-चोखा का प्रसाद बनाते हैं।

    इसके अलावा चरक संहिता के अनुसार, भुना हुआ चना शरीर के त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभाता है। शनि देव को वात को संतुलित करने से जोड़कर देखा जाता है।

    कुल मिलाकर शनिवार के दिन लिट्टी खाने की परंपरा सिर्फ स्वाद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आयुर्वेद, ज्योतिषीय अनुशासन और सात्विक जीवनशैली से भी जुड़ा है। यह भोजन अपनी प्राचीन जड़ों को आज भी मजबूत किए हुए है। बिहार के अलग-अलग राज्यों में भी लिट्टी-चोखा पसंद किया जाता है।

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