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पूजा के बाद आरती क्यों की जाती है? पुराणों में छिपे नियम और फायदे जानिए

Published: Fri, 14 Aug 2026 10:21 AM (IST)

पूजा के अंत में आरती का विशेष महत्व है, जो सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि अंधकार को मिटाने और मन को शांत करने का आध्यात्मिक तरीका है।

पूजा में आरती का महत्व (AI-Generated Image)

पूजा में आरती का महत्व (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी के घरों में या मंदिरों में जब भी पूजा होती है, तो अंत में घंटी और शंख की मधुर ध्वनि के साथ आरती जरूर की जाती है। बचपन से ही हम यह देखते आ रहे हैं कि बिना आरती के कोई भी पूजा, पाठ या हवन पूरा नहीं माना जाता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा के ठीक बाद ही आरती क्यों की जाती है? आइए, आज इस खूबसूरत और सुकून देने वाली परंपरा के पीछे छिपे गहरे अर्थ को समझते हैं।

पुराणों में आरती का महत्व

हमारे हिंदू धर्म के शास्त्रों में आरती का बहुत ऊंचा स्थान है। 'विष्णुधर्मोत्तर पुराण' में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से धूप और आरती के दर्शन करता है, उसकी कई पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है। वहीं, 'उत्तर स्कंद पुराण' भी एक बहुत ही प्यारी बात कहता है। इसके अनुसार, अगर आपको कोई कठिन मंत्र याद नहीं हो पा रहा है या आप पूजा की कोई विशेष विधि नहीं जानते हैं, लेकिन अंत में पूरे भाव से भगवान की आरती उतार लेते हैं, तो ईश्वर आपकी उस पूजा को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं।

'आरती' का असली मतलब क्या है?

असल में 'आरती' शब्द संस्कृत भाषा के "आरात्रिक" से बना है। इसका मतलब होता है कि अंधकार या अंधेरे को मिटाना। जब हम घी का दीपक या कपूर जलाकर भगवान के सामने घुमाते हैं, तो वह सिर्फ प्रकाश की एक लौ नहीं होती, बल्कि वह हमारी भक्ति, ज्ञान और समर्पण का प्रतीक होती है। पूजा करते समय जो एक सकारात्मक (पॉजिटिव) और दिव्य ऊर्जा पैदा होती है, वह आरती की लौ, घंटी की आवाज और हमारे गाए भजनों के जरिए पूरे घर के वातावरण में फैल जाती है।  

भटकते मन को शांत करने का तरीका

आपने महसूस किया होगा कि अक्सर पूजा में बैठे-बैठे हमारा ध्यान दुनियादारी की बातों में भटकने लगता है। लेकिन, आरती करते समय ऐसा कुछ नहीं होता। जब हम आरती करते हैं और उस जगमगाती लौ को एकटक निहारते हुए भजन गाते हैं, तो हमारा चंचल मन अपने आप शांत हो जाता है और पूरी तरह से भक्ति में डूब जाता है।

यही कारण है कि आरती के बाद हम दोनों हाथों से उस पवित्र लौ को स्पर्श करके अपने माथे से लगाते हैं, ताकि हम भगवान की उस शक्तिशाली और दिव्य ऊर्जा को एक आशीर्वाद के रूप में अपने भीतर ग्रहण कर सकें।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।