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    श्रीराम ही नहीं, लक्ष्मण भी हैं मर्यादा पुरुषोत्तम: रामचरितमानस का यह अनसुना रहस्य बदल देगा आपकी सोच

    Updated: Mon, 22 Jun 2026 12:30 PM (IST)

    श्रीराम और श्री भरत निर्गुण निराकार मौन हैं और सगुण साकार मौन हैं श्रीलक्ष्मण। सगुण मौन निर्गुण की तुलना में बहुत कठिन है। जहां पर बोलकर भी मौन रहा जा ...और पढ़ें

    रामचरितमानस का अनसुना रहस्य: लक्ष्मण ही हैं वास्तविक मर्यादा पुरुषोत्तम

    रामचरितमानस का अनसुना रहस्य: लक्ष्मण ही हैं वास्तविक मर्यादा पुरुषोत्तम

    स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। भगवान श्रीराम के वनवास काल के मध्य चित्रकूट में मौन के परमाचार्य श्रीभरत जी एक व्यावहारिक और राजनैतिक धर्मसंकट का अनुभव करते देखे गए, जब वे कहते हैं कि यहां उपस्थित प्रभु श्रीराम, मुनियों, गुरुजनों व ज्ञानी समाज और माताओं के समक्ष इस पवित्र स्थल पर आपके सामने मुझे कुछ भी पूछने या कहने का अधिकार नहीं है। भरत जी अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए कहते हैं, "इस विद्वानों के समाज और तीर्थ में पूजनीय लोगों से प्रश्नोत्तर करना मेरे लिए उचित नहीं है, पर यदि मैं चुप रहता हूं तो मुझे अशिष्ट या मलिन समझा जाएगा और यदि मैं बोलता हूं तो इसे मेरा पागलपन माना जाएगा। आगे वे कहते  हैं कि मैं बहुत छोटा हूं :

    एहिं समाज थल बूझब राउर।
    मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।
    छोटे बदन कहउं बड़ि बाता।
    छमब तात लखि बाम बिधाता।।

    श्रीभरत जी उस समय भी मौन रह गए, जब वे ननिहाल से लौटकर अयोध्या पधारे और प्रभु श्रीराम, श्रीसीता और लक्ष्मण के वन गमन का समाचार सुनकर पिताजी की मृत्यु को भूल जाते हैं।
    भरतहिं बिसरेउ पितु मरन सुनत राम वन गौनु।
    हेतु अपनपउ जानि जियं थकित रहे धरि मौनु।।

    मौन उस काल का नाम है, जब हम अपने किए को विस्मृत कर चुके हैं और ईश्वर के कार्यों को देखकर अचंभित और हर्षित होते हैं। मौन काल में वाणी औचित्य और अनौचित्य का संपादन और सुसृजन होता है। उस समयावधि में चित्त  मन और बुद्धि से परामर्श लेकर अहंकार को यह कहकर शांत करता है कि तुम्हारा किया तो कुछ है ही नहीं! जिस काल में हमारे कर्तृत्वों का कालदर्शन नहीं होता है, मौन की वही स्थिति है। अहं की सुषुप्त अवस्था में ही मौन परिभाषित होता है और स्वयं परम परम शांति का अनुभव करता है। मौन जब स्थिति को प्राप्त होता है, तब उस सुकाल में चित्तकक्ष पूर्ण रूप से रिक्त होता है। उस समय वहां किसी की भी उपस्थिति नहीं होती। जहां द्वितीय की उपस्थिति है, वहां मौन या तो किसी से प्रभावित होगा या प्रभावित करेगा। किसी व्यक्ति से प्रेरित भी हो सकता है या फिर किसी के प्रति कृतज्ञ। मौन स्थिति में न तो किसी को निमंत्रण है और ना ही किसी का बहिष्कार। वस्तुत: अपनी विस्मृति हो जाना ही मौन है और वही अपने स्वरूप की स्मृति भी है।

    वाणी व्यवहार विषयक है। इसका निर्माण उस मौन काल में ही होता है, जब चित्त अनहद को सुनता है। जब चित्त सुनता है, तब वाणी प्रथम हो जाती है और श्रुति द्वितीय होकर भी अद्वितीय ही रहती है। मौन में हमें कोई संकल्प नहीं करना होता है, क्योंकि संकल्प आते ही विकल्प उसके साथ आता है। चिंतन की यह नितांत स्वाभाविक प्रक्रिया है कि संकल्प और विकल्प दोनों संयुक्त ही रहते हैं और वे दोनों आपस में अभिन्न मित्र हैं। संकल्प-विकल्प दोनों मौन के विरोधी हैं। संकल्प विकल्प में गति है, चलने और पहुंचने की इच्छा है, पर मौन तो स्थापित है।

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    हमारी सनातनी परंपरा का पवित्र, सुगम और अगम ग्रंथ है गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस। हमारे गुरुदेव पूज्य महाराज श्रीरामकिंकर जी यदा-कदा अपने प्रवचन में अपने श्रोताओं से कहा करते थे कि यदि आप मुझे बोलता हुआ मानते हैं तो आपने गोस्वामी जी को नहीं सुना, केवल मुझे सुना, जबकि सत्य तो यह है कि मैं सुन रहा हूं और गोस्वामी जी बोल रहे हैं। यही अनुभव रामचरितमानस के सभी अनादि वक्ताओं का है। किसी ने अपने को कर्ता, लेखक, वक्ता नहीं माना। अपनी स्वीकृति श्रोता-वक्ता, लेखक-पाठक, दर्शक-अभिनेता के बीच मौन नहीं रहने देती है। लेखक पढ़ रहा हो, वक्ता सुन रहा हो। जो अभिनेता हो, वह दर्शकों की पंक्ति में हो, तब सृष्टि में सब कुछ तद् रूप और तत् रूप ही भासता है। यह वास्तविक मौन की चरम स्थिति है।

    पूरे रामचरितमानस में वाणी उपयोग के लिए यदि कोई पात्र सबके अधिक जाना जाता है, तो वे हैं रामानुज श्रीलक्ष्मण, किंतु हम वाणी के मूल में यदि मौन की भाषा को सुनना जान लें तो यह बहुत सहजता से समझ सकेंगे कि रामायण में सबसे बड़े मौनी हैं लक्ष्मण जी। उन्होंने मौन और वाणी को वास्तविक व्याख्या दी। वे जीवन में आमंत्रण और बहिष्कार से नितांत दूर हैं। लक्ष्मण जी को कभी अपनी स्मृति ही नहीं रहती है। केवल राम ही उनकी स्मृति हैं, राम ही उनकी वाणी हैं, राम ही उनके पुरुषार्थ और राम ही उनकी साधना हैं। वनवास निर्णय पर अयोध्या में उनके द्वारा माता कैकेयी या वहां के विधि-विधान पर कोई भी टिप्पणी न करना, कुछ न बोलना और जनकपुर की पुष्पवाटिका में श्रीराम द्वारा उन्हें संबोधित कर बोलने पर भी कुछ न बोलना, यही लक्ष्मण की मौन स्थिति है।

    मौन की स्थिति में परिस्थिति और बुद्धि का कोई स्थान ही नहीं है। जो राम की वाणी को सुनता है और सुन-सुनकर भरता जाता है, तब वह मौन हो जाता है। भर जाने के बाद तो मौन ही बचता है। मौन का तात्पर्य यह नहीं है कि मौनी गूंगा होता है। जिस बच्चे ने स्वर सुना ही नहीं, वाणी सुनी ही नहीं, वह बच्चा जन्मजात बहरा होगा, क्योंकि जन्मजात बहरा ही जन्मजात गूंगा होता है। तो क्या गूंगे को आप मौनी मान लेंगे? कभी भी नहीं। जो वाणी को सुनता है, श्रुति उसी में प्रवेश करती है। उसी का जीवन श्रुति है, श्रुति संमत है, श्रुति प्रमाणित है, जो अप्रमेय है।

    श्रीरामचरितमानस में मर्यादापुरुषोत्तम कौन है? सब कहेंगे अरे, यह तो सब जानते ही हैं कि मर्यादापुरुषोत्तम तो श्रीराम हैं। यदि कोई यह उत्तर देता है तो वह राम को नहीं जान पाया, पर अपने को जानने का प्रयास जारी रखना चाहिए। कहीं पढ़ लिया, बस हम भी उत्तर देना सीख गए कि श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। स्वयं समझना और अनुभव करना आवश्यक होता है। वास्तविक अर्थों में मर्यादापुरुषोत्तम तो लक्ष्मण हैं। श्रीराम तो प्रेम पुरुषोत्तम हैं। प्रेम न हो तो न तो मर्यादा का पालन होगा, ना ही वाणी का सार्थक उपयोग होगा। माता कैकेयी और भरत के प्रति श्रीराम का इतना प्रेम था, जिसके कारण वे मां से कुछ नहीं बोले। श्रीलक्ष्मण के हृदय में प्रभु की गरिमा की इतनी मर्यादा थी कि वे यदि माता कैकेयी से कुछ भी बोल देते तो भगवान राम के मातृप्रेम के प्रति मर्यादा का हनन हो जाता।

    मौन तो प्रेम की स्थिति में होता है। वहीं पर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की विस्मृति होती है। रामराज्य मर्यादा विषयक नहीं है। रामराज्य तो राम का साक्षात प्रेमाश्रित विग्रह है। श्री भरत जी अपने प्रभु श्रीरामचंद्र से जी से मिलने चित्रकूट गए तो श्रीराम और श्रीभरत दोनों मौन हो गए। कोई किसी से कुछ प्रश्न भी नहीं कर रहा है, ना ही भरत कुछ बता रहे हैं। यही मौन की स्थिति है। क्यों नहीं बोल रहे हैं? क्योंकि दोनों प्रेम से भरे हुए हैं।

    कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूछा।
    प्रेम भरा मन गति अति छूछा।।
    परम प्रेम पूरन दोउ  सभाई।
    मन बुधि चित अहमिति बिसराई।।

    पूछती है बुद्धि और उत्तर भी बुद्धि ही देती है। चित्त की इस पवित्र भूमि चित्रकूट में यहां न मन की सत्ता रही, न बुद्धि की। चित्त में कोई संस्कार बचा नहीं। अहंकार की सत्ता समाप्त, परिणामत: दोनों मौन हो गए। श्रीराम और श्री भरत निर्गुण निराकार मौन हैं और सगुण साकार मौन हैं श्रीलक्ष्मण। सगुण मौन निर्गुण की तुलना में बहुत कठिन है। जहां पर बोलकर भी मौन रहा जाए और न बोलकर भी मौन रहा जाए, वह है लक्ष्मण का मौन। लक्ष्मण वनवास के समय अयोध्या में माता कैकेयी के विरोध में इसलिए नहीं बोले, क्योंकि मौनी को वह कुछ नहीं चाहिए जो कैकेयी को चाहिए। मौन का परम आनंद कोई छीन ही नहीं सकता। श्रीलक्ष्मण के परमआनंद श्रीराम थे। उनका तो कुछ छूटा ही नहीं। कैकेयी को अपने पुत्र के लिए राज्य चाहिए था। कैकई का मौन टूट गया, पर भरत का मौन नहीं टूटा! क्योंकि उन्हें राज्य नहीं चाहिए था। राम के अतिरिक्त जो है, वह सब संसार है। निश्चित रूप से वह हमारा मौन छुड़ा देगा।

    जनकपुर की  पुष्पवाटिका में भगवान गुरुदेव विश्वामित्र के पूजन के लिए पुष्प लेने के लिए गए थे। श्रीसीता जी के सौंदर्य की प्रशंसा करते हुए भगवान राम लक्ष्मण को संबोधित करते हैं :

    तात जनक तनया यह सोई।
    धनुष यज्ञ जेहि कारन होई।।
    जासु बिलोकि अलौकिक सोभा।
    सहज पुनीत मोर मन छोभा।।

    भगवान श्रीसीता जी के सौंदर्य पर मुग्ध हैं, पर लक्ष्मण जी कोई उत्तर नहीं देते, क्योंकि वे प्रेम की मर्यादा जानने वाले मर्यादापुरुषोत्तम हैं। श्रीलक्ष्मण जानते हैं चंद्रमा और चकोर के बीच में द्वितीय की उपस्थिति होती ही नहीं है। प्रेम मौन चाहता है। वाणी द्वैत सिद्ध करती है। वस्तुत: लक्ष्मण भगवान के प्रेम में लुभाने के कारण नहीं बोले। प्रेम एक ऐसा राजा है, जिसको बिना किसी का तिरस्कार और बिना किसी को निमंत्रित किए आत्मानंद में रहकर मौन रहना होता है। वाणी को विश्राम देने के लिए मौन एक प्रक्रिया भी है। परशुराम जी के समक्ष महाराज जनक ने उनसे भयभीत होकर मौन स्वीकार कर लिया था। वह स्वस्वीकृत मौन है, क्योंकि व्यावहारिक सावधानी उसमें जाग्रत है।

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