आधुनिक योग के जनक महर्षि पतंजलि के 200 सूत्रों में छिपा है जीवन का सार: जानें 'चित्त वृत्ति निरोध' का अर्थ
योग को बताने के लिए पतंजलि ने योग-सूत्र में सटीक वाक्य 'चित्त वृत्ति निरोध' चुना। यह एक ऐसी तकनीक है, जो मुक्ति या आत्म-ज्ञान की ओर ले जा सकती है। अं ...और पढ़ें

आधुनिक योग के जनक पतंजलि के सूत्र और सद्गुरु का 'चित्त वृत्ति निरोध' पर ज्ञान
HighLights
पतंजलि का योग 'चित्त वृत्ति निरोध' है, मन को शांत करना
सद्गुरु के अनुसार यह सबसे बड़ी मानवीय उपलब्धि है
पतंजलि 200 सूत्रों से आधुनिक योग के जनक बने
सद्गुरु (ईशा फाउंडेशन के प्रमुख, आध्यात्मिक गुरु)। पतंजलि ने योग की परिभाषा 'चित्त वृत्ति निरोध' के रूप में दी है, जिसका असल मतलब है कि अगर आप मन की हलचल और गतिविधियों को निश्चल कर लेते हैं, तो आप योग की स्थिति में होते हैं। आपकी चेतना में सब कुछ एक हो जाता है।
हम अपने जीवन में कई चीजों के पीछे भागते हैं और उन प्रक्रियाओं से गुजरते हैं, जिन्हें हम उपलब्धियां कहते हैं, लेकिन मन की हलचल से परे जाना मूल और सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिसे कोई भी हासिल कर सकता है। क्योंकि यह इंसान को उस चीज से मुक्त करता है, जो वह तलाश रहा है। वह चाहे उसके भीतर हो या बाहर, हर चीज से। अगर वह बस अपने मन को निश्चल कर ले, तो वह परम संभावना बन जाता है।
मन समतल दर्पण बन जाता है, न कि टेढ़ी-मेढ़ी सतह वाले दर्पण की तरह। टेढ़ी-मेढ़ी सतह वाला दर्पण व्यक्ति के जीवन के पूरे बोध को विकृत कर देता है। कम से कम अगर आप उसमें न देखें, तो आपको कुछ अंदाजा हो सकता है कि आप कैसे हैं, लेकिन अगर आप रोज उसमें देखते हैं, तो वह आपको हर चीज का पूरी तरह से विकृत दृष्टिकोण देगा।
वर्तमान में अधिकतर इंसान अपने मन का उपयोग मात्र अपनी स्मृति और कल्पना के बीच कर रहे हैं। स्मृति और कल्पना दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। स्मृति अतीत का संग्रह है और कल्पना उसी का बढ़ा-चढ़ाकर देखा गया रूप है। अगर आप अपने मस्तिष्क को ऐसी स्थिति में ले जाएं, जहां आप न तो स्मृति से दूषित होते हैं और न ही कल्पना से भ्रमित होते हैं, तो वह सचमुच एक बुद्धिमान और पैना मस्तिष्क बन जाता है। वह सब कुछ देखता है, जो देखने योग्य है- जीवन और उसके स्रोत को।
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जीवनयापन की प्रक्रिया के लिए आपकी स्मृति और कल्पना पर्याप्त हैं, लेकिन अगर आप जीवन के दूसरे आयामों की खोजबीन करना चाहते हैं, तो स्मृति और कल्पना पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि वे मात्र आपके अतीत को ही रिसाइकिल करती हैं। जब आप अपने अतीत को दोहराते हैं, तो आपके जीवन का एक पैटर्न बन जाता है। और, अगर आपका दिमाग मात्र स्मृति और कल्पना में ही उलझा रहता है, तो वह कभी न टूटने वाला पैटर्न होता है। एक बार जब आप किसी पैटर्न में फंस जाते हैं, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह पैटर्न किसने बनाया था। वह एक तरह की परतंत्रता होती है। असल में, इसका आभास होना कि इंसान मनोवैज्ञानिक हकीकतों में फंसा हुआ है और सृष्टि की भव्यता के अस्तित्वगत अनुभव से चूक रहा है, स्वाधीनता की दिशा में पहला कदम है।
यही वजह है कि योग को बताने के कई सुंदर तरीकों में से, पतंजलि ने 'चित्त वृत्ति निरोध' शब्द चुना। एक ऐसी तकनीक, जो आपको आपकी मुक्ति या आत्म-ज्ञान की ओर ले जा सकती है। योग का पूरा विज्ञान अलग-अलग तरह के सूत्रों के रूप में बताया गया है। लगभग 200 सूत्र मिलकर योग के ज्ञान का पूरा ढांचा बनाते हैं। पतंजलि ने योग का आविष्कार नहीं किया था, उन्होंने इसे एक जीवन पद्धति में सम्मलित किया। इसीलिए उन्हें "आधुनिक योग का जनक" कहा जाता है। यह पहले से ही अलग-अलग रूपों में अस्तित्व में था और उन्होंने इसे सूत्रों के रूप में लिखा, जिन्हें जीवन के बारे में एक प्रभावी दस्तावेज माना जाता है।
यह अविश्वसनीय है कि किसी एक मनुष्य को जीवन के बारे में इतनी समझ हो सकती थी। उनकी समझ का दायरा सचमुच अविश्वसनीय है। आज के विद्वान तर्क देते हैं कि यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है, बल्कि इसे बनाने में कई लोगों ने काम किया होगा, क्योंकि यह इतना विशाल है कि किसी एक व्यक्ति की बुद्धि में नहीं समा सकता।यह एक ही व्यक्ति का काम है। पतंजलि शायद इस धरती पर हुए सबसे महान बुद्धिजीवियों में से एक हैं।
योग सूत्र शायद जीवन पर लिखी गई सबसे महान कृति है और साथ ही दुनिया की सबसे उबाऊ पुस्तक भी। पतंजलि ने इसे जान-बूझकर ऐसा लिखा, क्योंकि इसमें जीवन को खोलने के सूत्र हैं। यह न तो साहित्य है और न ही दर्शन। भाषा पर उनकी महारत ऐसी थी कि उन्होंने इसे सूत्रों के रूप में लिखा। यह बहुत उबाऊ है, लेकिन अगर एक भी सूत्र आपके भीतर फलित हो जाए, तो यह आपको अनुभव के एक बिल्कुल नए आयाम में ले जाएगा। अगर आप एक भी सूत्र पढ़ते हैं और उसे अपने जीवन में उतारते हैं, तो बस इतना ही काफी है। आपको सारे सूत्र पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।
पतंजलि योग सूत्र का प्रारंभ विचित्र ढंग से करते हैं। पहला सूत्र है, "...और अब, योग।" यह आधा वाक्य ही एक अध्याय है। उस आयाम की पुस्तक का प्रारंभ करने का यह बहुत विचित्र तरीका है। बौद्धिक रूप से, इसका कोई मतलब नहीं निकलता, लेकिन अनुभव के स्तर पर यह कह रहा है: "अगर आपको अभी भी लगता है कि नया घर बनाने, नई पत्नी खोजने या बेटी का विवाह करने से आपका जीवन संवर जाएगा, तो अभी योग का समय नहीं है।
लेकिन, अगर आपने पैसा, सत्ता, दौलत और सुख-सुविधाएं देख ली हैं, अगर आपने जीवन में हर वस्तु का स्वाद चख लिया है और यह महसूस किया है कि असली मायने में कोई भी वस्तु काम नहीं आने वाली है और अंततः आपको तृप्त नहीं करने वाली है, तब यह समय योग के लिए है।" पहला सूत्र "...और अब, योग।" का मतलब है कि आप जानते हैं कि कोई भी वस्तु काम नहीं करती और आपको अनुमान भी नहीं है कि असल में यह सब क्या है। अज्ञानता की पीड़ा आपको चीर रही है। अब, योग। अब जानने का एक मार्ग मौजूद है।