क्या मृत्यु के बाद ही मिलता है मोक्ष? जानिए जीते जी मुक्ति पाने का सबसे बड़ा रहस्य
यदि हमारे भीतर मोक्ष की इच्छा है तो हम मोक्ष नहीं पा सकते। क्योंकि मोक्ष का अर्थ ही है अपेक्षाओं और इच्छाओं से मुक्त हो जाना। यह करने की नहीं, बल्कि स ...और पढ़ें

क्या है मोक्ष का असली मतलब?
HighLights
लोग अक्सर मोक्ष पर चर्चा करते हैं।
जरूरी नहीं कि मरने के बाद भी मोक्ष मिले।
जीते जी भी मोक्ष हासिल किया जा सकता है।
मोरारी बापू (कथावाचक)। मोक्ष और मुक्ति जैसे विषयों पर अकसर चर्चा होती है। कुछ विचार ऐसे भी हैं कि जीवन का लक्ष्य ही मोक्ष है, मुक्ति है। जहां तक मैं अपनी बात करूं, तो मुझे मुक्ति नहीं चाहिए। मेरे लिए प्रभु नाम की मस्ती सबसे पहले है। मैं कथाओं में अकसर कहता हूं कि इच्छा से मुक्त हो जाना ही मोक्ष है। इच्छा के साथ मोक्ष कैसा, मगर मुश्किल यह है कि हम जीवन भर इच्छाओं और अपेक्षाओं से ही मुक्त नहीं हो पाते। बुद्ध ने भी कहा है कि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं। सब कुछ जानते-समझते हुए भी व्यक्ति इच्छाओं और अपेक्षाओं में घिरा रहता है। एक इच्छा पूरी होने पर मन दूसरी तरफ चला जाता है। यह मुक्ति या मोक्ष का मार्ग नहीं है।
मोक्ष के लिए मरना जरूरी नहीं
मेरी दृष्टि में मोक्ष के लिए मरना आवश्यक नहीं है। अंदर कुछ चीजें मर जाएं तो मोक्ष ही है। तीन बातें हमारे जीते जी मर जाएं तो मृत्यु ही मोक्ष है। आदमी मर जाए, मगर वासनाएं, इच्छाएं बची रहें तो वह मृत्यु है। वासनाएं मर जाएं और आदमी जीता रहे तो जीवन मुक्ति है। जहां बंधन हो वहीं मुक्ति की बात आती है। बंधन है ही नहीं तो मुक्ति कैसी? यहां कोई बंधन है ही नहीं। केवल भ्रम का बंधन है। सही बंधन हो तो खोला जा सकता है। गांठ कैसी भी हो, खोली जा सकती है, मगर भ्रम का बंधन कैसे खोला जाए? माना हुआ बंधन कैसे खोलें? मूल में जो आदमी बंधा ही नहीं, उसकी मुक्ति कैसी? जिसको मांगना पड़े, वह मोक्ष कैसा? मांगना, इच्छा करना तो मोक्ष में बाधा है। इच्छा से मुक्त हो जाना ही तो मोक्ष है। इच्छा के साथ मोक्ष कैसा?
भविष्य की चिंता मिटना ही मोक्ष है
हम भोजन क्यों करते हैं, तृप्ति के लिए। भोजन ही करना होता है और तृप्ति अपने आप आ जाती है। तृप्ति के लिए कोई क्रिया नहीं करनी पड़ती। आहार-विहार ठीक न होने के कारण पचाने के लिए चूर्ण आदि उपाय, क्रिया की जरूरत पड़ती है, क्योंकि हमने आहार-विहार ठीक से साधा नहीं। वैसे ही भजन करना, भक्ति करना आवश्यक है। मुक्ति के लिए और कुछ क्रिया करने की जरूरत नहीं है। भिक्षा भाव से भोजन करो तो तुम उपवासी हो। जो आए, वह भोजन स्वीकार। सत्संग से विवेक पाकर अभ्यास करते-करते तीन वस्तु मिट जाएं तो जीते जी हम मुक्त हैं- शोक, मोह और चिंता। कोई भी घटना घट जाए तो उसका शोक मत करो। सोने से पहले जो क्षय हुआ था, उसे भूल जाओ। घटी घटनाओं को भूलो, उसका शोक मत करो। अतीत का शोक न रहे, वर्तमान का मोह न रहे। अच्छा खाना मिला, खा लिया, मगर दोबारा मिलने का मोह ना रहे। भविष्य की चिंता मिट जाएं। यही मोक्ष है।
वैष्णव कौन हैं?
वैष्णव वह है, जो भविष्य की चिंता न करे। विष्णु का सेवक चिंता करे तो उसकी व्यापकता को दाग है। शोक जितना कम हो, उतना मोक्ष मुट्ठी में है। वर्तमान का मोह और भविष्य की चिंता जितनी कम हो, उतनी ही मुक्ति हमारी मुट्ठी में है। पुरुषार्थ जरूर करें, मगर चिंता न करें। प्रकृति का क्रम ऐसा चलता है कि कोई भी विपरीत परिस्थिति आ जाए, वह अनुकूल स्थिति को जन्म देगी ही। ऐसे ही अच्छी स्थिति भी सगर्भा है। वह प्रतिकूल स्थिति को जन्म देगी ही। आप स्वयं अपने अनुभव से इसे अनुभूत करो। जब क्रम ही ऐसा है तो कोई शोक क्या करना। चाय पीने में जो आनंद आता है, वह चाय हो जाने में नहीं आता। इसी तरह से परमात्मा को भजने में जो आनंद आता है, वह परमात्मा हो जाने में नहीं आता।
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श्रीकृष्ण ने गीता में क्या कहा
श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि केवल दो बातें अपनाने से कोई भी व्यक्ति संन्यासी हो सकता है। एक, जो व्यक्ति किसी से द्वेष न करे और दो, किसी से कुछ भी अपेक्षा न करे। ऐसा व्यक्ति गृहस्थी में रहते हुए भी संन्यासी है। द्वेषमुक्त जीवन और कामनामुक्त जीवन नित संन्यास है। विवेक के साथ धीरे-धीरे ऐसा हो सकता है। ये ऐसा संन्यास है, जिसके लिए हिमालय पर जाने की जरूरत नहीं है। साधक चाहे तो ये हो सकता है, मगर जीवन के जो महत्वपूर्ण सूत्र हैं, उनके प्रति हम इतने गंभीर नहीं हो रहे।
मेरा अनुभव है कि अगर आप किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखते तो पूरा अस्तित्व ही आपकी सेवा के लिए तत्पर रहता है। इहलोक और परलोक का कल्याण करने की बात मेरी दृष्टि में इह यानी अपने संसार के साथ-साथ, पर यानी दूसरों की संसार का भी कल्याण हो। अपने साथ दूसरों का भी कल्याण हो, ऐसा प्रयास करना ही इहलोक और परलोक को सुधारना है।
प्रस्तुति: राज कौशिक
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