संसार में रहकर भी कैसे रहें माया से दूर? भागवत पुराण के इस ज्ञान से खुलेंगे सफलता के मार्ग
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने गुरु सूर्य से अनासक्ति और अद्वैत की शिक्षा का वर्णन किया है। ...और पढ़ें

भगवान दत्तात्रेय ने सूर्य को क्यों बनाया अपना 7वां गुरु?
HighLights
सूर्य से सीखें अनासक्ति और अद्वैत का पाठ।
परोपकारी बनें, अहंकार रहित और समयबद्ध जीवन जिएं।
संसार में रहते हुए भी माया से मुक्त रहने का ज्ञान।
आचार्य नारायण दास (भागवताचार्य, महंत, भरतमिलाप आश्रम, ऋषिकेश)। श्रीमद्भागवत महापुराण जीवन को उत्कृष्ट बनाने की शिक्षा देता है। इसके एकादश स्कंध में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया है, जिसमें जीवन प्रबंधन के तत्व निहित हैं। आज जानते हैं दत्तात्रेय ने अपने सप्तम गुरु सूर्य से क्या शिक्षाएं ग्रहण कीं...
भारतीय आध्यात्मिक वांगमय में प्रकृति को भी गुरुतुल्य मानकर शिक्षा ग्रहण की गई है। भगवान दत्तात्रेय महाभाग राजा यदु को अपने 24 गुरुओं के विषय में बताते हैं। यह भी सिद्ध करते हैं कि ज्ञान किसी मठ या गुफा में ही नहीं, अपितु चराचर जगत के कण-कण में व्याप्त है। सुधी पाठकों, पिछले संस्करणों में छह गुरुओं की व्याख्या हो चुकी है।
संप्रति पुनः अपने सातवें गुरु के रूप में भगवान सूर्य से ग्रहण की गई शिक्षाओं का समुल्लेख करते हुए भगवान दत्तात्रेय महाभाग राजा यदु को उपदेशित करते हैं, हे राजन! सूर्य देव भी मेरे गुरुसदृश हैं, जो न केवल अंधकार का नाश करते हैं, अपितु साधक को अनासक्ति और अद्वैत का भी उत्तम पाठ पढ़ाते हैं, जो सांसारिक मायाजाल को खंड-खंड करने के लिए अमोघ शस्त्र है।
हे राजन! मनुष्यको सूर्य की भांति परोपकारी होना चाहिए। संसार में सभी जीवों का जीवन सूर्य से ही चल रहा है, पर उसे इस बात का अहंकार नहीं है कि वह संसार का जीवनदाता है। सूर्य समय पर उदय होता और समय पर अस्त होता है। हे राजन! एक साधक को समय प्रबंधन सूर्य से सीखना चाहिए। सूर्य उदय के समय भी प्रसन्न है और अस्त होते समय भी। इसी प्रकार हम भी जब अपने कार्यस्थल आदि को प्रस्थान करें, तो प्रसन्नतापूर्वक करें और जब वापस लौटें तो भी पूर्व की भांति ही सानंदित हों। एक परमार्थिक साधक को ऐसा प्रयास करना चाहिए कि अवसाद या उदासी उसके आध्यात्मिक जीवन को किसी भी प्रकार से प्रभावित न कर सके ।
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गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः॥
जैसे सहस्र रश्मियों के स्वामी भगवान सूर्य ग्रीष्म ऋतु में अपनी प्रखर किरणों से पृथ्वी के जल का संचय करते हैं, किंतु उस जल की मलिनता से स्वयं को लिप्त नहीं होने देते। वे जल को अपनी शक्ति बनाते हैं और पुनः वर्षा ऋतु के आगमन पर उसे लोकोपकार हेतु जगत को लौटा देते हैं।हे राजन! इसी प्रकार, एक साधक भी अपनी इन्द्रिय रूपी किरणों के माध्यम से समाज से आवश्यकता के अनुरूप जीविनोपयोगी वस्तु रूपी जल का ग्रहण तो करता है, पर उनमें रचता-बसता नहीं। वह संसार में रहते हुए भी संसार का नहीं होता। वह अपनी इंद्रियों का स्वामी है, दास नहीं। वह समय आने पर उन विषयों को अनासक्त भाव से त्याग देता है, जैसे सूर्य बादलों के माध्यम से अमृतमयी वर्षा कर रिक्त हो जाते हैं। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि उपभोग एक परमार्थिक मर्यादा मात्र हो, मोह या विलसाता नहीं।
हे राजन! आकाश के भाल पर चमकने वाला सूर्य तो केवल एक ही है, किंतु यदि धरती पर जल से भरे अनेक पात्र रख दिए जाएं, तो प्रत्येक पात्र में एक सूर्य दृष्टिगोचर होता है। वायु के वेग से जब जल चंचल होता है, तो सूर्य का प्रतिबिंब हिलता-डुलता, खंडित और अस्थिर दिखाई देता है। सत्संग वंचित, अल्पज्ञ और स्थूलबुद्धि वाले लोग भ्रमवश उन प्रतिबिंबों को ही वास्तविक सूर्य मान लेते हैं और उन्हें अनेक समझने की भूल कर बैठते हैं। किंतु ज्ञानी जानते हैं कि पात्र टूटे या जल हिले, वह मूल सूर्य तो निर्विकार और अखंड है। यही सत्य आत्मा का है। देह, मन और बुद्धि रूपी भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण ऐसा आभास होता है कि प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा अलग है। सत्य तो यह है कि वह परमात्मा रूपी सूर्य एक ही है, जो समस्त शरीरों में प्रतिबिंबित हो रहा है।
बुध्यते स्वे न भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।
लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत्॥
हे राजन! भेदात्मक दृष्टि अज्ञान का अंधकार है, जबकि अभेद दृष्टि आत्म-ज्ञान का परम प्रकाश है। सूर्य का जीवन एक निरंतर यज्ञ है। वह ग्रहण भी शुद्धि के लिए करता है और दान भी सृजन के लिए। यदि कोई भी मनुष्य सूर्य के इन दो सूत्रों अनासक्त कर्म और अद्वैत दृष्टि को अपने जीवन में उतार ले, तो वह संसार में रहते हुआ भी सदा जीवन मुक्त का अनुभव कर प्राप्त करता है।