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    क्यों अधिक मास में किया गया निस्वार्थ सत्कर्म और समाज सेवा देता है अक्षय फल?

    By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Mon, 25 May 2026 12:13 PM (IST)

    पुरुषोत्तम मास का मूल उद्देश्य मनुष्य को भौतिक आसक्तियों से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना की ओर प्रेरित करना है। दान इसी साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। ...और पढ़ें

    दिखावे से दूर श्रद्धा और विनम्रता का मार्ग।

    दिखावे से दूर श्रद्धा और विनम्रता का मार्ग।

    प्रो. रामनारायण द्विवेदी (महामंत्री, श्रीकाशी विद्वत परिषद, वाराणसी)। भारतीय सनातन संस्कृति में काल की प्रत्येक इकाई को धर्म, साधना एवं लोकमंगल से अभिन्न रूप से संबद्ध माना गया है। इन्हीं में पुरुषोत्तम मास अथवा अधिक मास का विशेष स्थान है। यह मास भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप को समर्पित माना गया है। सामान्यतः प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर आने वाला यह पवित्र मास आत्मशुद्धि, तप, जप, व्रत, स्वाध्याय तथा दान के लिए अत्यन्त पुण्यप्रद कहा गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस मास में किया गया प्रत्येक सत्कर्म अनेक गुना फल प्रदान करता है। विशेषतः दान का महत्व इस काल में अत्यधिक बढ़ जाता है, क्योंकि दान केवल भौतिक वस्तु का परित्याग नहीं, अपितु अहंकार, लोभ एवं स्वार्थ के विसर्जन का भी माध्यम है।

    इस महीने में दान, पुण्य या सेवा जो भी किया जाए, उसका अक्षय फल होता है। जरूरतमंदों की सेवा सर्वोत्तम है। इससे तीर्थस्नानादि के समान फल होता है। पुण्य कामों में व्यय करने से धन क्षीण नहीं होता, बल्कि बढ़ता है। विल्वपत्र से शिवपूजन, तथा नैमित्तिक पार्थिवार्चन, काशी में दशाश्वमेधघाट पर स्नान या अन्यत्र नदी में 10 दिनों तक स्नान, वृद्धि क्रम से गंगा स्तोत्र का नित्य पाठ आदि करना चाहिए। जिस प्रकार अणुमात्र बीज के दान करने से वट वैसा दीर्घजीवी महान वृक्ष होता है, वैसे ही पुरुषोत्तम मास में दिया हुआ दान अधिक फल देता है।

    पुरुषोत्तम मास का मूल उद्देश्य मनुष्य को भौतिक आसक्तियों से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना की ओर प्रेरित करना है। दान इसी साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। दानं तपश्च यज्ञश्च पावनानि मनीषिणाम्, यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि दान मनुष्य के अंत:करण को पवित्र बनाता है। जब व्यक्ति अपने अर्जित धन, अन्न, वस्त्र अथवा समय का अंश समाज के वंचित वर्ग के लिए समर्पित करता है, तब उसमें करुणा, सहानुभूति एवं परोपकार की भावना विकसित होती है। यही भाव भारतीय संस्कृति की आत्मा है।

    पुराणों में पुरुषोत्तम मास में अन्नदान, जलदान, गोदान, वस्त्रदान तथा विद्यादान को विशेष पुण्यकारी कहा गया है। वर्तमान युग में दान का स्वरूप केवल पारंपरिक वस्तुओं तक सीमित नहीं है। निर्धन विद्यार्थियों को पुस्तकें उपलब्ध कराना, रोगियों की सहायता करना, वृक्षारोपण करना, गौशालाओं एवं अनाथालयों में सहयोग देना अथवा भूखे व्यक्तियों को भोजन कराना भी दान की ही श्रेष्ठ अभिव्यक्तियां हैं। वस्तुतः जहां कहीं पीड़ित मानवता की सहायता होती है, वहीं दान का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।

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    पुरुषोत्तम मास में दान का सामाजिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। आज का समाज आर्थिक विषमता, उपभोक्तावाद एवं स्वार्थपरता की प्रवृत्तियों से ग्रस्त होता जा रहा है। ऐसे समय में दान की परंपरा समाज में समता, सहयोग एवं संवेदनशीलता का संदेश देती है। दान से समाज के दुर्बल वर्गों को संबल प्राप्त होता है तथा सामाजिक समरसता सुदृढ़ होती है। यदि प्रत्येक समर्थ व्यक्ति इस मास में अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान का संकल्प करे, तो अनेक निर्धनों की आवश्यकताओं की पूर्ति सहज संभव हो सकती है।

    ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि शास्त्रों ने दान में आडंबर एवं प्रदर्शन का निषेध किया है। निष्काम भाव से, श्रद्धा एवं विनम्रता के साथ किया गया दान ही वास्तविक पुण्य प्रदान करता है। केवल प्रसिद्धि अथवा यश प्राप्ति की भावना से किया गया दान आध्यात्मिक दृष्टि से अल्पफलदायी माना गया है। अतः पुरुषोत्तम मास हमें यह शिक्षा देता है कि दान का आधार करुणा एवं सेवा होना चाहिए, न कि अहंकार।

    अंततः कहा जा सकता है कि पुरुषोत्तम मास में दान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक परिष्कार एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का महान माध्यम है। यह मास मनुष्य को संयम, त्याग एवं लोकमंगल की भावना से युक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यदि हम इस पावन अवसर पर निस्वार्थ भाव से दान, सेवा एवं परोपकार को अपने जीवन का अंग बनाएं, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में शांति एवं संतोष की प्राप्ति होगी, अपितु समाज में भी सद्भाव, समरसता एवं मानवता का प्रकाश प्रसारित होगा।

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