सद्गुरु विशेष: जिसे आप आत्मविश्वास समझते हैं, क्या वह वाकई आपके अहं की एक झूठी पहचान है?
अहं एक परछाईं की तरह है। हमारे द्वारा बनाई हुई परछाईं, जिसे हम सत्य मानने लगे हैं। लेकिन सत्य वह है, जिसके कारण हमारा शरीर है, जिसके कारण हमारा अहं है ...और पढ़ें

सद्गुरु का जीवन दर्शन: मुश्किल हालातों में भी कैसे रहें शांत और आनंदित?
सद्गुरु (ईशा फाउंडेशन के संस्थापक आध्यात्मिक गुरु)। लोग सोचते हैं कि कुछ करने के लिए आत्मविश्वास की जरूरत होती है, लेकिन आत्मविश्वास से भरे हुए आप मूर्खतापूर्ण काम भी कर सकते हैं। कुछ करने के लिए आपको आत्मविश्वास की जरूरत नहीं है, आपको बस जरूरत है समझदारी की। उचित तो यह होगा कि आप पहले उस काम को तौलें। अगर आप कर सकते हैं, तो आप उसे करेंगे, अगर नहीं कर सकते, तो नहीं करेंगे। आपको बस अपनी योग्यता के अनुसार काम करना चाहिए, न कि आत्मविश्वास की वजह से या उसकी कमी की वजह से। सिर्फ एक अहं ही है, जिसे आत्मविश्वास या उसकी कमी महसूस होती है।
आखिर यह अहं है क्या? आप में अहं इसलिए नहीं आया, क्योंकि आपने कोई काम बहुत अच्छे ढंग से किया या आप अमीर बन गए, या आप सुंदर हो गए या आपने अपने शरीर को सुगठित बना लिया। जब आप पहली बार मां के पेट में लात चलाने लगे थे, तभी अहं का जन्म हो गया था। अपने स्थूल शरीर से स्वयं की पहचान बनाने की सबसे पहली गलती का मतलब है - अहं का जन्म।
अहं एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया है। इस नन्हे से शरीर से आपकी पहचान बना दी गई। इस छोटे से प्राणी को अपना वजूद बनाए रखना है, इस विशाल जगत में, जिसकी आपको इतनी भी समझ नहीं है कि यह कहां आरंभ होता है और कहां समाप्त? स्वयं को बस सुरक्षित बनाए रखने के लिए आपको स्वयं को एक बड़े इंसान की तरह दिखाना पड़ता है। इसलिए अहं पैदा हुआ है। यह एक झूठी हकीकत है। आप जिसे
आत्मविश्वास कहते हैं, वह बस एक झूठी पहचान है, जो आपने बनाई है, अपने वजूद को कायम रखने के लिए। अहं आपकी परछाईं की तरह है।
जैसे ही आपके पास स्थूल शरीर होता है, आपके पास परछाईं भी होती है। परछाईं खुद में न अच्छी है और न बुरी। अगर सूरज ऊपर आसमान में है, तो आपकी परछाईं छोटी है। अगर सूरज नीचे आगया है, तो आपकी मील भर लंबी परछाई होगी। तो बाहरी हालातों के जैसे भी तकाजे हों, आपकी परछाईं भी उसी तरह की हो जाती है। आपका अहं भी उसी तरह का होना चाहिए।
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अपने जीवन में तरह-तरह की स्थितियों से निपटने के लिए हमें विभिन्न तरह की पहचान की जरूरत होती है। अगर आप इस मामले में लचीले हैं, तो आप एक पहचान को सुंदरता से दूसरे में बदल सकते हैं। तब आप अपना किरदार भरपूर निभा सकते हैं और आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अभी समस्या यह है कि आपने इससे इतनी गहरी पहचान बना ली है कि आप विश्वास करने लगे हैं कि आप बस वह पहचान ही हैं।
एक बार जब आप विश्वास करने लगते हैं कि ‘मैं परछाईं हूं’ तो आप क्या करेंगे? तब आप धरती पर बस रेंगेंगे। तब आपकी जिंदगी कैसी होगी? अगर फर्श पर कालीन बिछा हो, यानी बाहरी हालात मुलायम घास जैसे हों, तो आप आराम से रेंगेंगे, लेकिन आनंद में नहीं। मान लीजिए कि राह में कंकड-पत्थर और कांटे आ जाएं, तो आप रोने लगेंगे। आपकी जिंदगी अभी इसी तरह से चल रही है, क्योकि आप धरती पर रेंग रहे हैं।
अभी आपके जीवन का संपूर्ण अनुभव बस भौतिक तक ही सीमित है। वह सब कुछ, जो आप अपनी पांच इंद्रियों के जरिए से जानते हैं, सिर्फ भौतिक है। भौतिक का स्वयं का कोई उद्देश्य नहीं होता, क्योंकि यह बस फल के छिलके की तरह है। फल के सिर्फ एक सुरक्षा-खोल की तरह इसका थोड़ा सा मतलब है। यह शरीर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके भीतर कुछ और भी है। आपने उस ‘कुछ और’ को कभी अनुभव नहीं किया।
अगर वह ‘कुछ और’कल सुबह शरीर से निकल जाए, तो इस शरीर को कोई छूना भी नहीं चाहेगा, जो एक लाश बन गया होगा। आज जब वह शरीर में है, हमें उसका ध्यान रखना चाहिए। वही सब कुछ है। अगर दुनिया में सब कुछ आपके विरुद्ध चल रहा है और आप अपने भीतर शांति से, उल्लास से, इस सब से अछूते, बिना प्रभावित हुए जीवन चला पाते हैं, तभी आप जीवन को जान पाते हैं कि वह कैसा है वरना तो आप भौतिकता के बस एक गुलाम होते हैं।