युद्ध की कगार पर खड़ी मानवता को बचा सकते हैं ये तीन शब्द, सत्य, प्रेम और करुणा
संसार में हम जो भी अशांति, दुख और भय का वातावरण देखते हैं, वह करुणा के अभाव के कारण है। यही कारण है कि आज के समय हमें अपने भीतर करुणा को जगाने की आवश् ...और पढ़ें

क्यों कहा जाता है रामचरितमानस को करुणा का ग्रंथ?
मोरारी बापू, कथावाचक। करुणा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। करुणा आज के समय की मांग है। मैं कथाओं में कहता रहता हूं कि करुणा की पुत्री का नाम अहिंसा है। सत्य का बेटा अभय है। प्रेम का एक पुत्र है, जिसका नाम त्याग है। सत्य से अभय आएगा और जो आदमी अभय है, वह शांत होगा ही। प्रेम से त्याग अवतरित होता है और "गीता" ने स्पष्ट कह दिया है कि त्याग से शांति की प्राप्ति होती है। करुणा से अहिंसा उत्पन्न होती है और अहिंसा जिस व्यक्ति में होगी, वह शांत होगा ही होगा। इसलिए मैं कहता हूं कि आज जब चारों तरफ अशांति दिखाई देती है, ऐसे समय में करुणा सबसे बड़ी आवश्यकता है।
बुद्ध की करुणा ने अहिंसा दी। भगवान महावीर स्वामी तो अहिंसा का व्रत लिए बैठे हैं। गांधी ने भी अहिंसा की बातें कीं, करुणा के बिना अहिंसा असंभव है। हिंसा क्रोध से होती है और क्रोध द्वैत होता है। आपको कोई दूसरा मिले तो ही आप क्रोध कर सकते हैं।
रामचरित मानस के बालकांड की पंक्ति है :
जेहि जन पर ममता अति छोहू।
जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥
वह एक ऐसा परमतत्व है, जो जिस पर ममता और छोह उड़ेल देता है, एक बार जिस पर करुणा कर देता है तो उस पर फिर कभी क्रोध नहीं करता। करुणावान कभी क्रोध नहीं कर सकता, इसलिए हम अपने जीवन में करुणा को अवतरित होने दें। मैं अक्सर कहता हूं कि युद्ध के कगार पर बैठी मानव जाति को सत्य, प्रेम और करुणा से ही बचाया जा सकता है। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। हम जीव हैं। प्रेम को शायद पूरा निभा भी न पाएं। हमारा प्रेम भी धोखे का रूप धारण कर सकता है। प्रेम दंभी हो सकता है। हमारा सत्य कमजोर हो सकता है, लेकिन करुणा मां है। स्त्री है। इसलिए धूसरित बच्चों को करुणा गोद में ले लेती है। करुणा बचेगी तो सत्य फिर साफ-सुथरा हो जाएगा। प्रेम के फटे कपड़ों की करुणा सिलाई कर देगी, क्योंकि करुणा मां का प्रतीक है।
रामचरितमानस करुणा का ग्रंथ है। मानस में 18 बार करुणा शब्द का उपयोग हुआ है। करुणा निधान, करुणानिधि करुणापुंज, करुणासागर, करुणासिंधु, करुणाभवन जैसे शब्द आए हैं। अहिंसा शब्द केवल एक बार आया है। कोई पूछ रहा था अहिंसा शब्द एक बार ही क्यों आया है? तुलसी शायद यह कह रहे हैं कि व्यक्ति के जीवन में, परिवार के जीवन में, समाज के जीवन में, प्रांत के जीवन में, राष्ट्र के जीवन में, विश्व के जीवन में केवल एक बार अहिंसा की प्रतिष्ठा हो जाए तो बेड़ा पार हो जाता है। लेकिन इस अहिंसा का जन्म करुणा से ही संभव है। करुणा अहिंसा की मां है।
रामचरितमानस के प्रत्येक सोपान में करुणा शब्द और भाव के दर्शन होते हैं। प्रथम सोपान बालकांड मेरी समझ में आनंद प्रधान है और आनंद करुणा से ही आता है। अयोध्या कांड आक्रंद (रुदन-विलाप) प्रधान कांड है। इसमें आक्रंद है और करुणा का संबंध आक्रंद के साथ भी है। तीसरा सोपान अरण्यकांड है। अरण्यकांड में आश्रम की भरमार है और जो आश्रम करुणा से जुड़ा हुआ न हो, वह आश्रम नहीं है। चौथा सोपान किष्किंधाकांड आश्रय का कांड है और आश्रय करुणा के बिना हो ही नहीं सकता। सुंदरकांड आशीष प्रधान कांड है। आशीर्वाद करुणा से ही दिया जाता है, कठोरता से नहीं। छठा कांड है लंका कांड, जो आतंक से भरा है। प्रभु ने भी कई राक्षसों को मारा है, लेकिन उसके पीछे करुणा जुड़ी है। उत्तरकांड मेरी समझ में आराम का कांड है- पायो परम विश्राम। आराम बिना करुणा के असंभव है।
मानस में करुणा को सागर कहा गया है, करुना सुखसागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। हम सब जानते हैं सागर रत्नाकर है। मंथन के माध्यम से भी 14 रत्नों की प्राप्ति हुई थी। हम भी करुणा सागर से कितने ही रत्न प्राप्त कर सकते हैं। उसकी कोई सीमा नहीं है, लेकिन कम से कम 14 रत्न तो प्राप्त करें। करुणा से पहला रत्न मिलता है- सुख। इस दुनिया में जिसको भी सुख मिला है, करुणा से ही मिला है। या तो स्वयं का दिल करुणा से भरा हुआ या किसी की हम पर करुणा हुई हो। कठोरता से किसी को सुख नहीं मिलता। करुणा सिंधु से दूसरा रत्न
निकलता है- निष्कामता। हमारे प्रयासों से कामना खत्म नहीं होती। शंकर को करुनाअयन कहा गया है। करुनाअयन की कृपा हो जाए तो हम निष्काम हो सकते हैं। तीसरा रत्न है अतिशय प्रियता। जिन जिन महापुरुषों ने करुणा का आश्रय किया है, वे समाज में अतिप्रिय बने हैं। ईर्ष्या, निंदा, दंभ, पाखंड से किसी की प्रियता हासिल नहीं की जा सकती। प्रियता प्राप्त होती है करुणापूर्ण हृदय से।
करुणा का चौथा रत्न है निरहंकारिता। हमारे जीवन में निरहंकारिता आए, उसके लिए जिसकी करुणा ने काम किया, उसे याद रखना चाहिए। पांचवां रत्न है सुजानता। सुजानता यानी हर एक वस्तु को ठीक से जानने वाला... करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो...। एक और रत्न बताऊं। व्यक्ति पर किसी की करुणा हो जाए तो व्यक्ति में वचन कौशल्य आ जाता है। जिस व्यक्ति में करुणा होती है, उसके शब्दों में शालीनता भी होती है।
करुणासागर का एक रत्न है दोषदलन। दोषों का समाप्त होना। करुणासिंधु का एक रत्न है स्वभाव की कोमलता। जिसके जीवन का केंद्र बिंदु करुणा होगी, उसके स्वभाव में कोमलता बहुत होगी। मानस में दशरथ के लिए धर्म धुरंधर शब्द का प्रयोग हुआ है- धर्म धुरंदर गुननिधि ज्ञानी। हृदयं भगति सारंगपानी।। सच्चे अर्थ में धर्म की धुरी वो ही उठा सकता है जिसने करुणा का अनुभव किया हो। बिना करुणा के फैला हुआ धर्म हिंसा ही करवाता है। धार्मिक व्यक्ति करुणा वाला होना ही चाहिए।
करुणा समुद्र का एक और रत्न है- सुंदरता। जिसको अपने जीवन को, तन मन को सुंदर रखना हो, वह करुणा का आश्रय करे। कठोरता और आक्रमकता आदमी को सुंदर नहीं रहने देतीं। करुणा रूपी समुद्र से एक रतन में निकलता है- दूसरों की पीड़ा समझने का मन। दुनिया में बहुत लोग दुखी हैं, लेकिन उनकी पीड़ा हम नहीं समझ पाते। हम क्यों दूसरों की पीड़ा नहीं जान सकते, क्योंकि करुणा का अभाव है। करुणा जिसमें फूटेगी, वह दूसरो की पीड़ा समझेगा। राम करुणामय हैं, इसलिए दूसरों की पीड़ा को जल्दी समझ लेते हैं।
विवेक सत्संग से मिलता है, लेकिन रामायणकार कहते हैं कि परम विवेक करुणा से मिलता है। परम विवेक एक बड़ा रत्न है। परम विवेक यानी अलौकिक विवेक, जिसे जगदगुरु विवेक चूड़ामणि कहते हैं। करुणा के सागर से 14वां रत्न निकलता है- निर्मल भक्ति। यह सर्वश्रेष्ठ रत्न है। करुणा बहुत उपयोगी औषधि है। करुणा इंसान को इंसान के काटने से बचा सकती है, फिर यह काटने की प्रक्रिया किसी हथियार से हो या शब्दों से। दुनिया करुणा छोड़ती चली गई है, इसलिए कठोर होती गई है। इस कठोरता को कम करने का एकमात्र उपाय है- करुणा।