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    नेतृत्व की असली परिभाषा: एक गृहिणी का समर्पण और अटूट प्रेम

    By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Mon, 04 May 2026 12:55 PM (GMT+05:30)

    जहां मां को पहली गुरु और करुणा व समर्पण का प्रतीक बताया गया है। मातृत्व दूसरों के लिए सर्वश्रेष्ठ की कामना करना, समाज को जोड़ना और सकारात्मक बदलाव लान ...और पढ़ें

    मातृत्व का सार: सृजन, नेतृत्व और निःस्वार्थ प्रेम का दिव्य अनुभव।

    मातृत्व का सार: सृजन, नेतृत्व और निःस्वार्थ प्रेम का दिव्य अनुभव।

    श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु)। भारतीय संस्कृति में यह मान्यता अनादि काल से रही है कि मां हमारी पहली गुरु और शिक्षिका होती है। आदि शंकराचार्य का प्रसिद्ध कथन कि “पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती” आज भी इस सत्य को रेखांकित करता है कि मातृत्व का मूल स्वभाव करुणा और समर्पण है। यह वह शक्ति है जो समाज को जोड़ती है, विविधताओं को समाहित कर लेती है और मतभेदों के बीच संतुलन बनाती है। मातृत्व का वास्तविक अर्थ दूसरों के लिए सर्वश्रेष्ठ की कामना करना है। समाज के सबसे उत्तम पहलुओं को एक साथ पिरोने का काम माताएं ही करती हैं। उनके पास सृजन करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की अद्भुत परिवर्तनकारी क्षमता होती है। मातृत्व की यह मिठास इतनी प्रबल होती है कि मां जो कुछ भी कहती है, हम उसे सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। मतभेदों को भुलाकर विविध स्वभाव के लोगों को एक साथ लाना, एक ऐसा कौशल है, जिसका प्रदर्शन वे अपने घरों में हर दिन करती हैं।

    वर्तमान समय में कामकाजी महिलाएं, काम और परिवार के बीच संतुलन बनाते हुए अक्सर ग्लानि से जूझती हैं। उन्हें लगता है कि क्या उन्होंने अपने कार्य के कारण अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दिया है। वास्तविकता में यह ग्लानि प्रेम के कारण है। जब भी आपको लगता है कि आपने पर्याप्त नहीं किया है, तो यह आपके प्रेम की निशानी है। इस निशानी को कभी मिटने न दें। प्रेम का स्वभाव ही ऐसा है कि वह कभी पूर्ण नहीं लगता। जितना अधिक हम करते हैं, उतना ही लगता है कि और किया जा सकता था। स्वयं के प्रति प्रशंसा का भाव रखें व अपनी संतान और परिवार को भाग्यशाली मानें।

    यदि नेतृत्व की वास्तविक परिभाषा देखनी हो, तो एक गृहिणी के जीवन को समझना होगा। वह बिना किसी औपचारिक पद या अवकाश के, चौबीसों घंटे अपने दायित्वों में संलग्न रहती है। उसका नेतृत्व आदेश देने में नहीं, बल्कि समन्वय स्थापित करने में है। वह परिवार के भीतर भावनात्मक संतुलन बनाए रखती है। वह संसाधनों का प्रबंधन करती है और हर सदस्य की जरूरतों को प्राथमिकता देती है। यह एक ऐसा नेतृत्व है जिसमें “देने” की भावना केंद्र में होती है। जब परिवार के अन्य सभी सदस्यों की छुट्टी होती है, तब गृहिणी का दिन और भी व्यस्त हो जाता है। रसोईघर के लिए कोई छुट्टियां नहीं बनी हैं और त्योहारों के अवसर पर तो गृहिणियां सामान्य दिनों से अधिक काम करती हैं। उनकी खुशी कुछ ‘पाने’ में नहीं वरन् कुछ ‘देने’ में निहित होती है।

    मातृत्व का संबंध देखभाल से है। मां अपनी संतान की बिना किसी अपेक्षा के केवल देखभाल करना चाहती है। यदि ‘यह संतान मेरी है’ क्योंकि मैंने इसे जन्म दिया है तो यह पहचान और मातृत्व भाव बहुत सीमित होगा। मातृत्व का भाव अवसर प्रदान करता है कि आप सभी से अपनत्व का भाव अनुभव करें। मातृत्व के भाव को विस्तार देने पर समूचा जगत ही अपना मालूम होता है। यह भाव आपको यह अवसर देता है कि आप प्रेम करें। मानवता के लिए योगदान दें और दूसरों की देखभाल करें। मातृत्व केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वभौमिक अनुभव है। जिस तरह एक मां अपने बच्चे का पोषण करती है, उसी तरह प्रकृति भी हमें संजोती है। धरती हमें जन्म देती है, हमारा पालन-पोषण करती है और अंततः हमें अपने भीतर समाहित कर लेती है। विपरीत परिस्थितियों में, तनाव और नकारात्मकता के बीच भी घर के भीतर सकारात्मकता बनाए रखना एक महत्वपूर्ण सामाजिक योगदान है।

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    पश्चिम में ईश्वर को प्रायः "पिता" के रूप में देखा गया, जो न्याय करने वाला, कठोर और अनुशासन लागू करने वाला है। जबकि पूर्व में ईश्वर को "माँ" के रूप में देखा गया, जो करुणामयी, प्रेमपूर्ण, क्षमाशील और बिना शर्त प्रेम करने वाली है। इसी कारण पूर्व में "आद्य शक्ति" यानी मूल ऊर्जा को मां माना गया। इसी दिव्य ऊर्जा से ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि की उत्पत्ति हुई। मातृत्व का अंतिम और सबसे गहरा रहस्य जीवन की नश्वरता को स्वीकार करने में है। मृत्यु को केवल शोक के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखना एक परिपक्व दृष्टिकोण है। जब जीवन को पूर्णता से जिया जाता है, प्रेम, सेवा और संतुलन के साथ, तब मृत्यु भय का विषय नहीं रह जाती है।

    मातृत्व का उद्देश्य केवल परिपूर्णता नहीं है। यह उस अनंत प्रेम का अनुभव है जो निरंतर बहता रहता है- कभी त्याग के रूप में, तो कभी असीम आनंद के रूप में। मातृत्व का सार है- अपने भीतर उस भाव को जीवित रखना, जो बिना शर्त देता है, जोड़ता है और हर परिस्थिति में जीवन को थोड़ा और मानवीय बना देता है। महिलाएं समाज में एक शांतिदूत की भूमिका निभा सकती हैं। वे घर, समुदाय, समाज और पूरी दुनिया में शांति स्थापित करने का सामर्थ्य रखती हैं।

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