सिर्फ एक पर्व नहीं, आत्मशुद्धि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का महाआह्वान है गंगा दशहरा
मां गंगा अध्यात्म का वह अनंत प्रवाह हैं, जिसने भारत की चेतना को जीवन प्रदान किया है। वे त्रिविध तापों का नाश करने वाली तथा त्रययोगों - ज्ञानयोग, भक्ति ...और पढ़ें

Ganga Dussehra 2026: दस पापों का हरण करती है पतितपावनी गंगा।
स्वामी अवधेशानन्द गिरि (जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामंडलेश्वर)। भारतीय अध्यात्म, संस्कृति और सभ्यता की चेतना में यदि किसी दिव्य धारा ने सहस्राब्दियों से जीवन, लोकमंगल, मोक्ष और आध्यात्मिक ऊर्जा का अविरल संचार किया है, तो वह है - पतितपावनी, मोक्षदायिनी, भागीरथी "मां गंगा"। गंगा केवल एक नदी नहीं, अपितु भारत की आत्मा, सनातन संस्कृति की जीवनरेखा तथा ऋषि-परंपरा की अमर वाहिनी हैं। वे भारतीय जनमानस की श्रद्धा, आस्था, तप, साधना और सांस्कृतिक निरंतरता की प्रतीक हैं। भारतीय वांगमय में गंगा को दिव्य चेतना की मूर्त अभिव्यक्ति माना गया है, इसीलिए भारत का सनातन धर्मावलंबी अनादिकाल से विनम्र होकर प्रार्थना करता आया है -
नमामि गंगे तव पाद पंकजम्,
सुरासुरैः वंदित दिव्य रूपम्।
भक्तिं मुक्तिं च ददासि नित्यं,
भावानुसारेण सदा नराणाम्।।
मां गंगा कल्याणमयी हैं, मधुर हैं, मंगलमयी हैं, मोक्षप्रदायिनी हैं। वे त्रिविध तापों का नाश करने वाली तथा ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग - इन त्रय योगों की सिद्धि प्रदान करने वाली दिव्य अमृतधारा हैं। भारतीय संस्कृति की सुषुम्ना नाड़ी के रूप में प्रवाहित गंगा केवल भूगोल नहीं, अपितु अध्यात्म का वह अनंत प्रवाह हैं, जिसने भारत की चेतना को जीवन प्रदान किया है। विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर, आद्य सभ्यता तथा दैवीय संवेदनाओं का सनातन प्रवाह यदि किसी रूप में पृथ्वी पर दृष्टिगोचर होता है, तो वह गंगा के रूप में ही है।
देवभूमि उत्तराखंड की पुण्यभूमि हरिद्वार इस दिव्य चेतना का एक महान केंद्र है। हिमालय की गोद से अवतरित होकर जब मोक्षदायिनी मां गंगा हरिद्वार की धरती का स्पर्श करती हैं, तब यह भूमि केवल एक नगर नहीं रह जाती, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का जीवंत तीर्थ बन जाती है। यहां का प्रत्येक घाट, प्रत्येक मंदिर, प्रत्येक आरती और प्रत्येक शंखध्वनि भारतीय संस्कृति की सनातन चेतना का उद्घोष करती प्रतीत होती है। हरिद्वार की “हरकी पैड़ी” केवल एक घाट नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक संगम है, जहां श्रद्धा और परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी को मनाया जाने वाला “गंगा दशहरा” इसी दिव्य अवतरण की स्मृति का पावन पर्व है। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार, इसी दिन मां गंगा स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, राजा सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी महान तपश्चर्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित होने को तैयार हुईं, किंतु उनके प्रचंड वेग को धारण करने की क्षमता पृथ्वी में नहीं थी। तब भगवान शिव ने करुणावश उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया और तत्पश्चात गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं। इसी कारण गंगा “भागीरथी” कहलाईं और भगवान शिव “गंगाधर”।
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यह कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि तप, त्याग, लोकमंगल और संकल्प की दिव्य प्रेरणा है। "गंगा दशहरा" का पर्व हमें यह संदेश देता है कि महान प्रयत्न, तपस्या और लोकहित की भावना से ही दिव्यता पृथ्वी पर अवतरित होती है। "गंगा दशहरा" के दिन हरिद्वार में अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता है। प्रातःकाल से ही श्रद्धालुओं का सैलाब हरकी पैड़ी तथा विभिन्न घाटों पर उमड़ पड़ता है। भक्तजन मां गंगा में स्नान कर अपने समस्त पापों के क्षय तथा मोक्ष की कामना करते हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन गंगा स्नान करने से दस प्रकार के पापों का नाश होता है। “दशहरा” शब्द का अर्थ भी “दस पापों का हरण” माना गया है। ये दस पाप तीन दैहिक, चार वाणी से संबद्ध तथा तीन मानसिक पाप माने गए हैं। अतः इस दिन स्नान, दान, जप, तप और उपासना का अक्षय फल प्राप्त होता है।
सायंकाल हरिद्वार की “गंगा आरती” इस पर्व का दिव्यतम आकर्षण बन जाती है। जब सैकड़ों दीपों की स्वर्णिम ज्योति मां गंगा की लहरों पर झिलमिलाती है, घंटों और शंखों की ध्वनि संपूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है। उस क्षण ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं देवगण इस अलौकिक अनुष्ठान के साक्षी हों। “हर-हर गंगे” और “जय मां गंगे” के घोष से संपूर्ण वातावरण दिव्यता से अनुप्राणित हो उठता है। भारतीय वांगमय में गंगा का माहात्म्य अनंत रूप से वर्णित है। ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, पुराण तथा अनेक स्तोत्रों में गंगा को मोक्षदायिनी कहा गया है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य ने भी गंगा स्तोत्र में प्रार्थना की है -
देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे,
त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे।
शंकरमौलिविहारिणि विमले,
मम मतिरास्तां तव पदकमले।।
गंगा भारतीय संस्कृति की आधारशिला हैं। उनके तटों पर ऋषियों ने तप किया, वेदों और उपनिषदों का प्राकट्य हुआ, भारतीय दर्शन और सभ्यता का विराट स्वरूप विकसित हुआ। गंगा ने केवल शरीरों को नहीं, बल्कि चेतना को भी पवित्र किया है। वे जीवन, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और मोक्ष की अविरल धारा हैं। गंगा को “त्रय योग सिद्धिप्रदायिनी” भी कहा गया है। ब्रह्मा के कमंडल से प्रकट होने के कारण वे ज्ञानयोग की प्रतीक हैं, भगवान विष्णु के चरणों से प्रवाहित होने के कारण भक्तियोग की अधिष्ठात्री हैं और भगवान शिव की जटाओं में अवतरित होकर वैराग्ययोग की सिद्धिदात्री बनती हैं।
इस प्रकार गंगा संपूर्ण योगमार्गों का समन्वित स्वरूप हैं। भारतीय जनमानस में गंगा के प्रति श्रद्धा इतनी गहन है कि मृत्यु के पश्चात भी मनुष्य अपने तारण हेतु गंगा के आश्रय की कामना करता है। गंगाजल में अस्थि-विसर्जन की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मोक्ष और अमृतत्व में विश्वास की अभिव्यक्ति है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य की किरणों से निकलने वाले
जीवनतत्व को धारण करने का सामर्थ्य केवल गाय और गंगा में है; अतः उनका स्मरण, पूजन और संस्पर्श देवताओं तथा पितरों को तृप्त करता है। किंतु आज की भौतिकवादी प्रवृत्तियों ने गंगा की निर्मलता और अविरलता को गंभीर संकट में डाल दिया है। प्रदूषण, अवैज्ञानिक निर्माण, औद्योगिक अपशिष्ट तथा प्रवाह में बाधाएं गंगा की पवित्रता को आहत कर रही हैं। यह केवल एक नदी का संकट नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर आघात है। हमें यह समझना होगा कि गंगा ईश्वरीय द्रव हैं, जिनके अवतरण हेतु भगीरथ और उनके पूर्वजों ने कठोर तप किया था। इसलिए गंगा की शुचिता, सातत्य, अविरलता और निर्मलता का संरक्षण हमारा परम कर्तव्य है।
हालांकि सरकार की “नमामि गंगे” योजना के माध्यम से गंगा की स्वच्छता और अविरलता के लिए अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। गंगा की रक्षा के लिए सामूहिक चेतना, जनजागरण और प्रत्येक नागरिक की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है। गंगा सबकी हैं - वे अनगिनत जैव प्रजातियों, वनस्पतियों, संस्कृतियों और सभ्यताओं को युगों से पोषित करती आई हैं। यदि गंगा का अस्तित्व संकट में पड़ा, तो मानवता की एक गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा भी संकटग्रस्त हो जाएगी।
अतः "गंगा दशहरा" केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सांस्कृतिक जागरण, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और लोकमंगल का महाआह्वान है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि मां गंगा की पावन धारा अनादि काल से मानवता को जीवन, शांति, मोक्ष और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती आई है। आइए, इस "गंगा दशहरा" पर हम सभी संकल्प लें कि मां गंगा की निर्मलता, अविरलता और पवित्रता की रक्षा हेतु अपना सक्रिय योगदान देंगे। गंगा केवल नदी नहीं, अपितु भारत की जीवनरेखा, संस्कृति और संस्कारों की सनातन संवाहिका हैं। ऐसी मोक्षदायिनी, पतितपावनी मां गंगा को कोटिशः प्रणाम एवं “गंगा दशहरा” की मंगलमयी शुभकामनाएं।