गर्मी में जलदान का महत्व: क्या कहता है शास्त्र? जानें जल की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक शक्ति
गर्मी में जलदान करना सबसे बड़ा पुण्य का काम है। जानें जल की महिमा और जलदान का महत्व। ...और पढ़ें

ऋग्वेद से पुराणों तक: जल के तीन स्वरूप और जीवन में जलदान का पुण्य।
प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री (पूर्व अध्यक्ष, ज्योतिष विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)। मनुष्य ही नहीं, देहधारी समस्त जीवों के जीवन में जल की महती भूमिका होती है। किसी भी धार्मिक कार्य से पूर्व स्नान, जलावगाहन परमावश्यक होता है। तदनंतर आसन की पवित्रता, पूजन सामग्री की पवित्रता एवं आत्मशुद्धि हेतु जल से मार्जन करना परम आवश्यक माना गया है। ब्रह्मवैवर्त्य पुराण में पवित्रता हेतु प्रसिद्ध मंत्र उल्लिखित है, जिसे प्रायः सभी धर्माचार्य तथा सनातन धर्मावलंबी किया करते हैं। मंत्र है-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥
जल शब्द के लिए वैदिक वांगमय में मुख्यतः "आप" शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके अनेक पयार्यवाची नामों का उल्लेख ऋषियों ने विभिन्न देवताओं की स्तुति करते हुए किया है, जो जल के गुणों के सूचक भी हैं। स्वरूप दृष्टि से यह द्रव रूप है, किन्तु अत्यधिक शीत में यह हिम (बर्फ) रूप में परिवर्तित हो जाता है। तब यह ठोस भी होता है, इसके अन्य रूप कुहासा, निहार, तुषार आदि है। सूर्य की प्रखर किरणों के द्वारा तप्त होने पर यह वाष्प बनकर बादल हो जाता है, तब यह गैस रूप भी होता है। इस प्रकार जल द्रव, ठोस और गैस की दृष्टि से तीन प्रकार का होता है। इसमें सोम के साथ अग्नितत्त्व भी रहता है। जैसा की ऋग्वेद के "आपः" सूक्त में कहा गया है-
अप्सु मे सोमा अब्रवीदंतविश्वानि भेषजा।
अग्नि च विश्वशंभुवमापश्च विश्वभैषजी।।
महर्षि व्यास ने जल में विद्यमान अग्नि को तीन रूपों में माना है-
वैद्युत जाठरः सौरो ह्यपांगर्भास्रयोऽग्नयः।
तस्मादपः पिबन् सूर्यो गोभिर्दीप्त्यसौ दिवि।।
अर्थात जल के गर्भ में रहने वाली अग्नि तीन प्रकार की होती है-वैद्युत्, जाठर, सौर। इसीलिए सूर्य जल का पान करते हुए आकाश में अपनी किरणों से प्रकाशित होता है। मनु ने भी कहा है कि यदि ठीक ढंग से अग्नि में आहुति दी जाए तो वह जाकर सूर्य में प्रतिष्ठित हो जाती है। सूर्य से ही वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न होता है और उससे सभी प्राणी जीवित रहते हैं -
अग्नौप्रास्ताहुतिः सम्यक् आदित्यमुपतिष्ठते।