बिना राम नाम के कैसा है जीवन? यहां पढ़ें किन 14 लोगों को शास्त्रों में माना गया है जीवित शव
जो व्यक्ति भगवान की भक्ति से विरत है, वह श्रीरामचरितमानस की दृष्टि में शव के समान है। जब तक व्यक्ति मद और मोह का त्याग नहीं करता है, तब तक उसे राम नाम ...और पढ़ें
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श्रीरामचरितमानस के ये 14 लक्षण कर देंगे हैरान!
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने जो कुछ दिया है, वह भक्तों को रस लगता है। ज्ञानियों को तत्व लगता है। कर्मयोगियों को लक्ष्य लगता है और शरणागतों को अपना अभीष्ट लगता है।
जिन्ह हरिभगति ह्रदयं नहिं आनी।
जीवत सव समान तेइ प्रानी।।
जीवन और मृत्यु के संदर्भ को बालि पुत्र अंगद ने लंकाधिपति रावण के समक्ष जरा कठोर भाषा में प्रस्तुत किया है। कठोर इसलिए, क्योंकि हनुमान जी विनम्रता की भाषा बोलकर जा चुके थे। अंगद का प्रयोग उस परंपरा से जरा-सा हटकर था। जिसने भगवान की भक्ति नहीं की, रामायण की दृष्टि में वह प्राणी जीवित रहते हुए भी मृत है। राम नाम के बिना तो सरस्वती की वाणी भी शोभा नहीं देती है, पर जब तक व्यक्ति मद और मोह का त्याग नहीं करता है, तब तक उसे राम नाम समझ नहीं आता है। राम नाम के बिना व्यक्ति वैसे ही अशोभनीय लगता है, जैसे कोई सुंदर स्त्री बहुत से आभूषण पहने हो, पर शरीर पर वस्त्र का अभाव हो तो उस स्त्री की ओर कोई सभ्य व्यक्ति दृष्टि नहीं डालता है।
श्रीरामचरितमानस में श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास जी ने वेद, महाभारत, अन्य पुराण, स्मृतियों शास्त्रों और लोक परंपराओं के मन को, परिस्थिति और मन:स्थिति तथा भावस्थिति को निचोड़कर ऐसा राम रसायन तैयार किया है, जिसके आचमन मात्र से अविद्या, अस्मिता राग, द्वेष और अभिनिवेश से न केवल मुक्ति मिल सकती है, अपितु हम मृत्यु से अमृतत्व की ओर बढ़ जाएंगे, पर इस अमृतत्व को प्राप्त करने के लिए हम एक आशापूर्ण निवेदन और विनती आपसे कर सकते हैं कि धर्म को लेकर अपनी पूर्व मान्यताओं की दूषित और अपभ्रंश व्याख्या से जरा-सा ऊपर उठकर यह समझने का प्रयास करें कि इसमें क्या कोई ऐसी बात है, जो किसी भी व्यक्ति का अहित कर रही है? यदि नहीं, तो हमें अपनी इन मान्यताओं पर पुनर्विचार कर लेने में कोई हानि नहीं है कि हम अपनी अगली पीढ़ियों को क्या देकर जाना चाहते हैं?
रावण में सब कुछ है, पर हरिभक्ति तथा रामनाम का अभाव उसे जीवित ही मृत कर देता है। रावण ने अंगद से जिस अशिष्ट भाषा का प्रयोग करके अपने अनित्य बल का बखान किया, उससे सिद्ध हो गया कि रावण के शब्दकोष में केवल आत्मप्रशंसा और परनिंदा के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने 14 अंक को बड़े मार्मिक अर्थों में प्रयुक्त किया है। 14 वर्ष के लिए ही भगवान बन गए। वनवास के मार्ग में महर्षि बाल्मीकि भगवान श्रीराम से उनके रहने के लिए 14 प्रकार के भक्तों के हृदय का वर्णन किया। यहां पर अंगद ने भी रावण को उसकी सभा के समक्ष ही 14 प्रकार से मृत घोषित कर दिया। जो रावण हनुमान जी से प्रीति की भाषा नहीं सीख सका हो तो अब उसको नीति की भाषा में सिखाने लिए भगवान श्रीराम ने बालिपुत्र अंगद को लंका भेजा। अंगद ने जिस भाषा में रावण से संवाद किया, वह हनुमान जी के लिए संभव नहीं था, क्योंकि युवा में जो वाक्चातुर्य, उत्साह, अपराजिता बुद्धि के साथ जो तेजस्वी पराक्रम होता है, वह सबके लिए संभव नहीं है।
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अंगद ने रावण पर व्यंग्य करते हुए कहा कि हे लंकेश! मैं जब लंका कि ओर आ रहा था, उस समय हमारे प्रभु श्रीराम की सेना के कुछ साथियों ने हमसे यह कहा था कि लंका में एक व्यक्ति ऐसा है, जिसके 10 सिर हैं, पर वह बीस आंख वाला अंधा और बीस कान वाला बहरा है। जरा उससे मिलकर आना। अंगद ने कहा कि मैंने यहां बहुत खोजा कि ऐसा विचित्र प्राणी कहां मिलेगा... पहले लगा कि लंका के स्वामी रावण तुम हो! तुम्हारे 10 सिर देखकर हमें लगा कि यही वह अभागा है, किंतु फिर हमने तुम्हारे अंदर कुछ ऐसे लक्षण देखे, जिससे बीस कान बाला बहरा और बीस आंख वाले बहरे की उक्ति पूरी तरह कट गई, क्योंकि बंदरों ने 20 आंख वाले अंधे और 20 कान वाले बहरे की बात तो उसके लिए कही थी, जो लंका में जीवित है, किंतु तुम्हारे लक्षणों से तो हमें लगा कि तुम जीवित ही नहीं हो। तुम तो जीवित रहते हुए ही मरे हुए हो।
तब अंगद ने साहित्य, अनुभव, संस्कृति और इतिहास से सीखे एवं अपने एकत्रित गुणों के 14 भाग कर दिए। रावण पर आरोप और व्यंग्यात्मक शैली में अंगद ने कहा…...
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी।।
तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी।।
1. वाममार्गी : सामाजिक मर्यादाओं ओर परंपराओं से ठीक उल्टा चलता है।
2. कामी : जिसके जीवन में काम के ऊपर कोई नियंत्रण नहीं है, उसे संसार में इतना कलंक सहना पड़ता है कि वह जीवित रहते ही मर जाता है।
3. कृपण : जो महाकृपण है, तमाम धन होते हुए भी न अपने ऊपर और न ही समाज के कल्याण के लिए कुछ भी खर्च करता है, ऐसा प्राणी जीवन में ही मृत के समान होता है।
4. विमूढ़ : जो बिल्कुल विमूढ़ हैं, मूर्ख हैं, न तो सही जानते हैं न ही गलत जानते हैं। शंकर जी ने पार्वती जी से जो कहा- हे रावण, वह तेरे अंदर और बाहर साक्षात घट रहा है।
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि विमुख न धर्म रति॥
5. अत्यंत मूर्ख : संसार में जो अति दरिद्र है, वह भी मरा हुआ ही समझना चाहिए। यहां अंगद के विवेक से दरिद्रता का अर्थ यह है कि जिस रावण के पास सोने की लंका है। विश्वसुंदरी मंदोदरी जैसी पत्नी है। संसार के कितने किन्नरों और गंधर्वों की कन्याओं का हरण करके उनके कौमार्य का हनन करने के पश्चात भी जिसे मातुश्री सीता का हरण कर उन्हें अपनी पत्नी बनाने की इच्छा अभी शेष है तो तुझसे बड़ा दरिद्र और कौन होगा?
6. बहुत बूढ़ा : व्यक्ति भी मरे के समान ही होता है।
7. सदा रोगबस : जो सदा रोगबस रहता है। अंगद ने कहा कि रावण! तू तो वह रोगी है, जिसके शरीर और मन दोनों में वे सारे रोग व्याप्त हैं।
8. संतत क्रोधी : जो हमेशा क्रोध में रहकर किसी के लिए कुछ भी कह देता है, ऐसे को भी मरा समझना चाहिए।
9. विष्णु विमुख : जो संसार का उद्भव, पालन और लय करने में समर्थ होते हुए भी परम दयालु हैं, तू उन राम से भी विरोध मानता है। तू धर्ममार्ग से च्युत होकर अधर्म को ही धर्म मानकर विपरीत जीवन का सेवन कर रहा है तो तू मरा हुआ ही है।
10. श्रुति संत विरोधी : जो वेदों का ज्ञाता तो है, पर श्रुति विरोधी जीवनयापन करता है। पुराणों की अनुकरणीय कथाओं को नहीं सुनता है। जो संत का विरोध करता है।
11. तनु पोषक : तू केवल शरीर की ही भाषा जानता है और शरीर की ही पूजा करने में दिनरात लगा रहता है।
12. निंदक : मनुष्य, देवता, भगवान, भक्त, भक्ति, प्रिय, भाई तू सबकी निंदा करता है। जिसकी जिव्हा पर कभी भगवान का पावन नाम आता ही नहीं है। तू अकारण ही दूसरों की बुराई या आलोचना करता है।
13. अघ खानी : तू पापों की खदान है, इसीलिए रावण के मरने पर गोस्वामी जी ने लिखा-
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी।
निज अघ गयउ कुमारगगामी।।
रावण अपने ही पापों के परिणामस्वरूप सद्मार्ग की जगह कुमार्ग की ओर चला गया।
14. अति अभिमानी : हनुमान जी ने तुझसे कहा था कि तुझे मोह का रोग हो गया है, जिसके कारण तेरे अंदर सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी अभिमान का अतिरेक है। कोई भी गुण क्यों न हो और कोई भी गुणी क्यों न हो, जिसके जीवन में गुणों का संतुलन नहीं है, उसका जीवन तो अतिरेक भरा होगा। अतिरेक चाहे गंगा में हो, चाहे समुद्र में हो, वह अपने तटवासियों को उजाड़ डालता है। बाढ़ और तूफान ही अतिरेक के स्वरूप हैं। तेरे जीवन में प्रवाह न होकर अपने गुणातिरेक के कारण पूरी लंका तुझसे त्रस्त है। तेरी पत्नी मंदोदरी, तेरा भाई कुंभकर्ण और विभीषण, माल्यवंत, सब लोग तेरे अतिरेक से त्रस्त हैं।
चौदह वर्षों के बनवास से श्रीराम ने रामराज्य की स्थापना की और रावण ने अपनी मृत्यु का काल चुना।