साधना और सेवा का पर्व: सोमवती अमावस्या और पुरुषोत्तम मास का दिव्य संयोग
अमावस्या का सोमवार से योग सोमवती अमावस्या कहलाता है। इस बार अधिक ज्येष्ठ मास का भी योग पाकर यह तिथि अधिक पुण्यदायी हो गई है... ...और पढ़ें

सोमवती अमावस्या और अधिक मास का शुभ संयोग
डा. प्रणव पण्ड्या, (प्रमुख, अखिल विश्व गायत्री परिवार एवं आध्यात्मिक विचारक)। भारतीय संस्कृति में पर्व, व्रत और विशेष तिथियां धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही आत्मचिंतन, आत्मशोधन और आध्यात्मिक उन्नति के महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करती हैं। हमारे ऋषि-मनीषियों ने जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए समय-समय पर ऐसे पर्वों और साधना-पर्वों की व्यवस्था की है, जो व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और आत्मविकास के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं।
सोमवती अमावस्या और अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) दोनों ही इसी श्रेणी के अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर हैं। जब इन दोनों का शुभ संयोग बनता है, तब ये साधना, उपासना और आत्मपरिष्कार के लिए अधिक पुण्यदायी हैं।
सोमवती अमावस्या का महत्व
सोमवती अमावस्या वह अमावस्या है, जो सोमवार के दिन पड़ती है। भारतीय ज्योतिष एवं आध्यात्मिक परंपरा में सोमवार का संबंध भगवान शिव तथा मन के अधिष्ठाता चंद्रमा से माना गया है। चंद्रमा मन का प्रतीक है और अमावस्या आत्ममंथन का अवसर। इसलिए सोमवती अमावस्या को मन की शुद्धि, विचारों के परिष्कार, संयम और आध्यात्मिक जागरण के लिए विशेष फलदायी माना गया है।
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यह तिथि व्यक्ति को बाहरी व्यस्तताओं से हटकर अपने अंत:करण की ओर देखने और जीवन की दिशा का पुनर्मूल्यांकन करने की प्रेरणा देती है। वहीं अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) भारतीय पंचांग में समय-समय पर आने वाला अतिरिक्त मास है। शास्त्रों में इसे भगवान विष्णु का प्रिय मास बताया गया है। इस मास का मूल उद्देश्य मनुष्य को सांसारिक व्यस्तताओं के बीच कुछ अतिरिक्त समय आत्मविकास, साधना, स्वाध्याय और सेवा के लिए प्रदान करना है। मान्यता यह भी है कि इस अवधि में किए गए जप, तप, दान, उपासना और सत्कर्मों का आध्यात्मिक प्रतिफल अधिक प्राप्त होता है। वस्तुत: यह मास जीवन की दिशा और दशा को सुधारने का एक विशेष अवसर के रूप में माना गया है।
पर्वों और व्रतों का आध्यात्मिक महत्व
अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्यश्री ने अपने साहित्य में पर्वों और व्रतों के आध्यात्मिक एवं नैतिक पक्ष को अधिक महत्व दिया है। उनके अनुसार प्रत्येक पर्व आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम और जीवन में श्रेष्ठता के संवर्धन का अवसर है। इसी दृष्टि से अधिक मास और सोमवती अमावस्या का संयोग व्यक्ति को अपने भीतर झांकने, दुर्गुणों को त्यागने और सद्गुणों को विकसित करने की प्रेरणा देता है।
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यह समय काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को कम करने तथा प्रेम, करुणा, सेवा, सहयोग, संयम और सद्भाव जैसे दिव्य गुणों को विकसित करने का है। गायत्री महामंत्र का जप, ध्यान, स्वाध्याय, यज्ञ तथा लोकमंगल की भावना से किए गए सेवा कार्य इस अवधि को सार्थक बनाते हैं। मौन साधना और भगवद् स्मरण से मन को शांति, स्थिरता और अंत:करण को पवित्रता प्राप्त होती है। व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्यों को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाता है और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन तिथियों को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखें, बल्कि इन्हें आत्मपरिष्कार, सद्विचारों के संवर्धन, परिवार में संस्कारों के विकास तथा समाजोपयोगी कार्यों से जोड़ें। यदि इन अवसरों पर वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, नशामुक्ति, शिक्षा सहयोग या अन्य लोकमंगलकारी गतिविधियों के संकल्प लिए जाएं तो उनका प्रभाव समाज पर भी सकारात्मक रूप से दिखाई देगा।