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अष्टमी पर जन्मे कृष्ण क्यों कहलाते हैं संतुलन के देव? जानिए उनके व्यक्तित्व का गहरा रहस्य

Published: Mon, 31 Aug 2026 02:43 PM (IST)

जब कर्म में निर्लिप्तता, संघर्ष के मध्य आनंद, संबंधों के बीच प्रेम और हृदय में समर्पण का जन्म होता है ...और पढ़ें

कृष्ण का अद्वितीय व्यक्तित्व: संतुलन, आनंद और आकर्षण का गहरा रहस्य

कृष्ण का अद्वितीय व्यक्तित्व: संतुलन, आनंद और आकर्षण का गहरा रहस्य

श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु)। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को हुआ था। अष्टमी तिथि अर्थात अर्धचंद्र का दिन, जो पूर्ण प्रकाश और पूर्ण अंधकार के मध्य परिपूर्ण संतुलन को दर्शाता है। यह अवस्था हमें जीवन के उस संतुलन की याद दिलाती है, जिसका साक्षात स्वरूप श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व है। वे दृश्य जगत में पूरी तरह सक्रिय हैं और फिर भी अदृश्य चेतना में पूर्णतः स्थित हैं। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अत्यंत अद्वितीय और अगम्य है।

वे एक महान गुरु हैं, आध्यात्मिक प्रेरणा के स्रोत हैं और साथ ही कुशल राजनीतिज्ञ भी हैं। एक अवधूत बाहरी जगत से विरक्त रहता है, जबकि भौतिक जगत में पूरी तरह रमा हुआ व्यक्ति आध्यात्मिक आयाम से अनभिज्ञ हो सकता है। श्रीकृष्ण इन दोनों छोरों को एक साथ समाहित करते हैं।

जीवन में अपनी भूमिका पूरी तरह निभानी है, लेकिन भीतर से यह जानना है कि हम अपनी भूमिका से कहीं अधिक हैं। हम पिता, माता, पुत्र, मित्र, नागरिक, अधिकारी या किसी भी पद पर हो सकते हैं, लेकिन हमारी वास्तविक पहचान इन भूमिकाओं से परे है। हम उस चेतना का अंश हैं, जो इन सभी भूमिकाओं को निभाती है और फिर भी उनसे निर्लिप्त रहती है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण का जीवन हमें कर्म और वैराग्य के बीच संतुलन सिखाता है। जन्माष्टमी मनाने की सार्थकता तब है, जब हम अपने जीवन में कुछ अंश अवधूत का और कुछ अंश कर्मठता का समाहित कर सकें।

कृष्ण आनंद के भी प्रतीक हैं। वे विशुद्ध आनंद और परमानंद के साक्षात स्वरूप हैं। जब जीवन में यह आनंद जागता है, तो शिकायतें और क्रोध धीरे-धीरे विलीन होने लगते हैं। जीवन बोझ नहीं रह जाता, वह एक खेल की भांति दिखाई देने लगता है। शायद यही कारण है कि भगवान कृष्ण से हर कोई जुड़ सकता है। बच्चे उनमें अपना नटखटपन देखते हैं, किशोर और युवा उनकी मित्रता और सहजता से जुड़ते हैं। गृहस्थ उनके जीवन में अपने संघर्षों और जिम्मेदारियों की झलक पाते हैं। योगी उनमें योगेश्वर को देखते हैं और राजनेता उनमें नीति और नेतृत्व की दृष्टि पाते हैं।

कृष्ण सबके लिए हैं, क्योंकि कृष्ण किसी एक भूमिका में बंधे हुए नहीं हैं। आप उन्हें बुद्ध की भांति मौन में देख सकते हैं, रणभूमि में योद्धा की भांति देख सकते हैं, परम सखा के रूप में अनुभव कर सकते हैं या अत्यंत नटखट बालक के रूप में। कृष्ण का व्यक्तित्व जीवन की अनेक संभावनाओं को अपने भीतर समाहित करता है।

कृष्ण के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है-आकर्षण। मन और इंद्रियों का स्वभाव ही ऐसा है कि वे उस ओर खिंचते हैं, जो अधिक आकर्षक हो। यदि किसी को इस दृश्यमान जगत के आकर्षणों के बीच कोई सूक्ष्म बात प्रस्तुत करनी हो, तो उस आंतरिक आयाम को बाहरी सुखों से कहीं अधिक आकर्षक होना होगा। श्रीकृष्ण की चेतना में वही आकर्षण था। उनकी उपस्थिति मनुष्य को सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठाकर भीतर की चेतना की ओर ले जाती थी। कृष्ण इसलिए आकर्षक हैं, क्योंकि वे हमें उस आकर्षण की ओर ले जाते हैं, जो बाहर नहीं, भीतर है। वास्तव में कृष्ण हमसे बाहर नहीं हैं। कृष्ण चेतना हम सभी के भीतर सदैव उपस्थित है।

श्रीकृष्ण का संदेश है कि वे बलवानों में बल, बुद्धिमानों में बुद्धि और प्रत्येक प्राणी में विद्यमान प्राणशक्ति हैं। जिस चेतना के कारण हम सोचते-समझते, प्रेम, कर्म और जीवन का अनुभव करते हैं, उसी चेतना की गहराई में कृष्ण का निवास है। जन्माष्टमी अपनी चेतना में उस विराट संभावना को फिर से जगाने का अवसर है। हम कृष्ण के गुणों को अपनी चेतना में जाग्रत करें। जब जीवन में कर्म हो, तो कृष्ण की कर्मठता हो। जब परिस्थिति कठिन लगे, तो उनकी स्थिरता हो। जब संबंधों में हों, तो उन्हीं की तरह मित्रता का भाव हो। जब मन चंचल हो, तो उनके मन का भाव सघन हो जाए। तब जन्माष्टमी हमारे भीतर घटित होने वाली एक घटना बन जाएगी।

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