सिर्फ 1 व्रत से मिलता है सालभर की 24 एकादशियों का पुण्य: शास्त्रों में सबसे श्रेष्ठ है निर्जला एकादशी
निर्जला एकादशी (25 जून) का वास्तविक उद्देश्य केवल उपवास करना नहीं, बल्कि आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का अभ्यास करना है। इस ...और पढ़ें

निर्जला एकादशी: सालभर के पुण्य का एक व्रत, जानें महत्व और विधि
स्वामी अवधेशानन्द गिरि (जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामंडलेश्वर)। रसनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान श्रीविष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। वर्षभर में आने वाली 24 एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की "निर्जला एकादशी" का विशेष स्थान है। धर्मशास्त्रों में इसे सभी एकादशियों में श्रेष्ठ बताया गया है। यह व्रत इतना महत्वपूर्ण माना गया है कि श्रद्धा एवं नियमपूर्वक इसके पालन से वर्षभर की समस्त एकादशियों के व्रत का पुण्य प्राप्त होने का विधान बताया गया है। इसी कारण इसे एकादशी-राज भी कहा जाता है। निर्जला एकादशी को "भीमसेनी एकादशी" तथा "पांडव एकादशी" के नाम से भी जाना जाता है।
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार पांडवों में बलशाली भीमसेन अत्यधिक भूख के कारण नियमित रूप से एकादशी व्रत का पालन नहीं कर पाते थे। उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो सके। तब महर्षि व्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर व्रत रखने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और भगवान श्रीहरि की कृपा प्राप्त की। तभी से यह व्रत “भीमसेनी निर्जला एकादशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
निर्जला एकादशी का वास्तविक उद्देश्य केवल उपवास करना नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का अभ्यास करना है। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर भगवान श्रीविष्णु, श्रीलक्ष्मी तथा तुलसी का पूजन किया जाता है। श्रद्धालु व्रत का संकल्प लेकर दिनभर भगवन्नाम-स्मरण, मंत्र-जप, गीता एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ तथा सत्संग में समय व्यतीत करते हैं। अनेक भक्त रात्रि-जागरण कर भजन-कीर्तन और प्रभु-चिंतन में लीन रहते हैं। द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण कर व्रत सम्पन्न किया जाता है।
निर्जला एकादशी का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व सेवा, दान और परोपकार की भावना को सुदृढ़ करता है। ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड गर्मी में प्यासे एवं जरूरतमंद लोगों को शीतल जल उपलब्ध कराना, जलसेवा करना, फल, छाता, पंखा, वस्त्र तथा अन्न का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। भारतीय संस्कृति में दान को केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का श्रेष्ठ माध्यम माना गया है। इसलिए निर्जला एकादशी लोकमंगल और करुणा का भी संदेश देती है।
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आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत मनुष्य को त्याग, अनुशासन और आत्मबल का पाठ पढ़ाता है। जल जैसी मूलभूत आवश्यकता का त्याग कर साधक अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास करता है तथा ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण को सुदृढ़ बनाता है। यह व्रत हमें जल का महत्व बताता है और सिखाता है कि जीवन की वास्तविक उन्नति केवल भौतिक साधनों से नहीं, बल्कि संयम, भक्ति, सेवा और सदाचार से होती है।
इस प्रकार निर्जला एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, ईश्वरभक्ति, लोकसेवा और आध्यात्मिक जागरण का महोत्सव है। यह पावन व्रत मानव जीवन को धर्म, संयम और करुणा के आदर्शों से जोड़ते हुए भगवान श्रीविष्णु की कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर प्रदान करता है।