तकनीक के युग में गुरु का महत्व: इंटरनेट सूचनाएं देता है, लेकिन सच्चा विवेक गुरु से ही मिलता है
भारतीय संस्कृति में गुरु का महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था। तकनीक केवल जानकारी देती है, जबकि सच्चा गुरु विवेक, नैतिकता और ...और पढ़ें
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तकनीक के दौर में गुरु का महत्व: विवेक और जीवन निर्माण का सच्चा मार्गदर्शक
शैलबाला पण्ड्या (गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार की अधिष्ठात्री)। भारतीय संस्कृति में गुरु के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए
कहा गया है- गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अर्थात गुरु ब्रह्मा के समान ज्ञान का सृजन करते हैं, विष्णु के समान शिष्य का संरक्षण करते हैं और महेश्वर के समान अज्ञान का नाश करते हैं। गुरु ही वह शक्ति हैं जो मनुष्य को सत्य, ज्ञान और श्रेष्ठ जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
गुरुदेव युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने गुरु को जीवन निर्माण की एक महत्वपूर्ण शक्ति माना है। उन्होंने कहा है कि सच्चा गुरु केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं होता, बल्कि वह शिष्य के अंतर्मन में छिपी श्रेष्ठ संभावनाओं को जाग्रत करने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरु मनुष्य के विचारों को परिष्कृत कर उसके चरित्र, संस्कार और कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का कार्य करता है। वह शिष्य को आत्मिक विकास, नैतिकता और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। गुरुचरणों की समर्पित साधिका परम वंदनीया गुरु मां भगवती देवी शर्मा ने भी गुरु-शिष्य परंपरा को जीवन की अमूल्य धरोहर माना। उनका जीवन गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण, श्रद्धा और सेवा भावना का प्रेरणादायक उदाहरण है। उन्होंने सदैव यही संदेश दिया कि गुरु के मार्गदर्शन से मनुष्य अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, नैतिक जागरण और समाज सेवा के उच्च आदर्शों को अपना सकता है।
गुरु का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देना होता है। गुरु अपने अनुभव और ज्ञान से शिष्य को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने, सही निर्णय लेने और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ने की प्रेरणा देता है। जीवन में यदि सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त हो जाए तो यह सबसे बड़ा सौभाग्य माना जाता है। सद्गुरु के मार्गदर्शन से व्यक्ति अपनी कमजोरियों को पहचानता है, उन्हें दूर करता है और अपनी क्षमताओं का विकास करता है। एकलव्य, स्वामी विवेकानंद और छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से गुरु की महत्ता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
आज के आधुनिक युग में जब ज्ञान और तकनीक के अनेक साधन उपलब्ध हैं, तब भी गुरु की आवश्यकता कम नहीं हुई है। जानकारी को विवेक में बदलने, जीवन मूल्यों को समझने और सही दिशा चुनने के लिए गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। गुरु वह दीपक है, जो स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों के जीवन में ज्ञान और संस्कारों का प्रकाश फैलाता है। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व हमें अपने गुरुओं के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हम गुरु के आदर्शों को अपनाकर ज्ञान, सेवा, विनम्रता और सदाचार के मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन को श्रेष्ठ एवं सार्थक बनाएं।