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    शूर्पणखा है काम, समुद्र है लोभ: गुरु के अनुसार श्रीराम की तरह मौन और धैर्य से जीतें ये विकार

    Updated: Mon, 27 Jul 2026 02:51 PM (IST)

    मोरारी बापू ने गुरु पूर्णिमा पर सद्गुरु के महत्व को बताया, जिसमें उन्होंने काम, क्रोध और लोभ जैसे विकारों पर श्रीराम के मौन और धैर्य से विजय पाने के त ...और पढ़ें

    श्रीराम की तरह काम, क्रोध और लोभ पर पाएं विजय

    श्रीराम की तरह काम, क्रोध और लोभ पर पाएं विजय

    मोरारी बापू, कथावाचक। हमारे देश की गुरु परंपरा में सद्गुरु सम्राटों का सम्राट और फकीरों का फकीर है। गुरु पूर्णिमा गुरु कृपा में भीग जाने का दिन है। लोग संसार में लूटपाट करने में लगे हैं। लूटना ही है तो सद्गुरु की ज्ञान संपदा, उनके भाव, उनके वैराग्य, उनके प्रकाश, उनके धवल जीवन को लूटो। ये सब लुटने पर भी सदगुरु अपने आप को खाली नहीं, भरा हुआ महसूस करता है। कोई भी सम्राट साम, दाम, दंड, भेद से साम्राज्य का संचालन करता है, मगर सद्गुरु सान (संकेत), दान, दंडवत और वेद से। सद्गुरु शिष्य की बाधाओं को दूर करने के लिए समय-समय पर सान (संकेत) करता है।

    शिष्य की तीन बाधाएं प्रमुख हैं- काम, क्रोध और लोभ। रामचरितमानस में परशुराम क्रोध हैं। पूरी जनकपुरी जब लक्ष्मण के लिए कह रही थी कि यह बालक अनुचित कर रहा है, तब राम ने संकेत से लक्ष्मण को नियंत्रित किया। इसका प्रभाव यह रहा कि कुछ देर बाद स्वयं परशुराम कहने लगे कि मैंने बहुत कुछ अनुचित बोल दिया। सद्गुरु बताता है कि क्रोध से जब भी पाला पड़े, वाम वाणी का त्याग व्यक्ति को कर देना चाहिए। सूर्पनखा काम है। वह भड़काने वाला राग रूप लेकर पंचवटी में आई तो राम ने लक्ष्मण को इशारा किया कि इसके नाक-कान काट लो।

    सद्गुरु बताते हैं कि काम से मुक्त होना है तो उसके नाक-कान काटने होंगे। गंध और आवाज के बाद ही काम में व्यक्ति दृष्टि, स्पर्श और फिर पतन तक पहुंचता है। सद्गुरु बताता है कि प्रत्येक गंध को प्रभु की गंध मानो। जगद्गुरु राम ने लक्ष्मण को तीसरा इशारा उस समय किया, जब समुद्र द्वारा रास्ता ना दिए जाने से लक्ष्मण गुस्से में थे। समुद्र लोभ है। संसार में उसके समान लोभी दूसरा नहीं है। वह सारे रतन छुपाए हुए है। जब लक्ष्मण क्रोध में थे तो राम ने इशारा किया कि धैर्य रखो। सद्गुरु बताता है कि जीवन में जब भी लोभ से सामने हो जाए तो व्यक्ति को धीरज रखना चाहिए। लोभ समुद्र है। उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। उस पर सेतु बनाकर ही उसका पार पाना संभव है।

    सद्गुरु दानी होता है, वह देता है- अभयदान, क्षमादान, नाम या मंत्रदान, प्रेमदान या भक्तिदान और विद्यादान। सम्राट दंड देता है, जबकि सद्गुरु दंडवत करता है। हम लोग प्रणाम करते हैं, मगर सद्गुरु अंदर से दंडवत कर लेता है। सम्राट भेद कर सकता है, लेकिन सद्गुरु कभी भेद नहीं करता। वह भेद नीति नहीं, वेद नीति अपनाता है। जो इन चार नीतियों को अपनाते हैं, ऐसे सद्गुरुओं की यह गुरु पूर्णिमा है। मेरे सद्गुरु दादा श्री त्रिभुवन दास ने मुझे मानस के अमृत का पान कराया, गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर उन्हें नमन करता हूं।   

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