मानव शरीर नाव और सद्गुरु हैं इसके खेवैया; केवल गुरु कृपा से ही मिलता है सच्चा बोध
मानव शरीर को दुर्लभ नाव और सद्गुरु को इसका कुशल खेवैया बताया गया है, जो भवसागर पार कराता है। गुरु की कृपा से ही सच्चा बोध और ज्ञान मिलता है, जैसा कि फ ...और पढ़ें
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सद्गुरु की कृपा से ही संभव है जीवन की नैया पार लगाना
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण (आध्यात्मिक गुरु, हनुमन्निवास, अयोध्या)। जीवन एक समुद्र-यात्रा है। अगाध जलराशि, उत्ताल तरंगें और दुर्लभ नौका के सहारे संसार-समुद्र के पार जाना है। ऐसे में कुशल कर्णधार (खेवैया) मिल जाए तो डूबने की आशंका निवृत्त हो जाती है। संत एवं शास्त्र सद्गुरु को ही कर्णधार कहते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, मानव-शरीर दुर्लभ नाव है। भगवत्कृपा अनुकूल वायु है और गुरु इस नाव के खेवनहार हैं। इस दुर्लभ संयोग का लाभ लेकर भवसिंधु के पार जाना ही मानव-जीवन का परम फल है। आर्ष परंपरा गुरु को ही बोध का हेतु मानती है।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं कहकर गुरु की वाणी को ही मंत्र का स्वरूप माना गया है। शब्द की यात्रा जिस अर्थ की प्रतीति कराती है, वह अर्थबोध गुरु की कृपा से ही घटित होता है। श्वेताश्वतर उपनिषद कहता है कि जिसके अंत:करण में ईश्वर के समान ही गुरु के प्रति भक्ति होती है, शास्त्र अपने रहस्यों को उसके हृदय में प्रकट कर देते हैं। संत दादू दयाल का प्रसिद्ध दोहा स्मरण करने योग्य है, जिसमें वे कहते हैं कि सद्गुरु शब्द की मार करता है। गुरु की तत्वबोध कराने वाली वाणी ही शब्द की मार है। उस तत्वप्रकाशिका वाणी का अनुभव मुझे अपने पूज्य गुरुदेव ‘श्री फलाहारी बाबा’ के समीप हुआ।
एक प्रसंग का यहां उल्लेख करता हूं। एक बार कानपुर में गुरुदेव के सम्मुख जिज्ञासु प्रश्न कर रह थे और मैं गुरुदेव की अनुज्ञा प्राप्त कर कुछ उत्तर देता जाता था। अकस्मात एक प्रश्न आया कि भगवान को कमल पुष्प अधिक प्रिय क्यों है? मैं ठिठक गया। अनेक युक्तियां आ रही थीं चित्त में, परंतु कोई संतोषजनक उत्तर नहीं आ रहा था, मैंने कहा कि पूज्य गुरुदेव, इस पर कुछ कहें। श्री महाराज जी ने कहा कि इसमें कठिनाई क्या है। भगवान सब में व्याप्त होते हुए भी सबसे निर्लिप्त हैं। यही गुण कमल में भी है, वह जल में रहकर भी भीगता नहीं, इसीलिए भगवान को विशेष प्रिय है।
इसका तात्पर्य यह है कि जो संसार में रहकर भी उसमें आसक्त नहीं है, वही भगवान को प्रिय होता है। प्रश्नोत्तर असंगता के उपदेश की ओर मुड़ गया। अनेक बार मैंने यह अनुभव किया कि, जब लिखी-पढ़ी युक्तियां समाधान नहीं दे पातीं तो पूज्य गुरुदेव अपने सहज-बोध से चमत्कृत कर देते थे। मैंने पाया है कि स्वाध्याय के अनेक प्रयत्न भी वैसा बोध नहीं जगा सकते, जैसा गुरुदेव की मुस्कान भर से हो सकता है।