अहंकार छोड़ गुरु-चरणों में पूर्ण समर्पण ही है ज्ञान की पहली सीढ़ी; सूचना नहीं गुरु देते हैं विवेक
आचार्य नारायण दास बताते हैं कि गुरु परंपरा हिमालय से निकली है और गुरु ही वास्तविक ज्ञान व विवेक देते हैं, सूचनाएं नहीं। ज्ञान की पहली सीढ़ी अहंकार छोड ...और पढ़ें
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अहंकार त्याग कर गुरु चरणों में समर्पण से मिलता है ज्ञान
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम मायाकुंड, ऋषिकेश)। भगवत्कृपा से मेरी गुरु-परंपरा देवात्मा हिमालय के तुषाराच्छादित शिखरों से निस्सृत हुई है, जिसके पवित्र आशीष और दिव्य मार्गदर्शन से आज सहस्रों आत्माएं स्वकल्याण तथा लोक-कल्याण के पुनीत कार्य में संलग्न हैं। मेरे दादागुरुदेव, साकेतवासी प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्रीविष्णुदास जी महाराज, हिमालय के परम महनीय सिद्ध संत रहे हैं।
कंचन जैसी काया पर मात्र एक कोपीन धारण कर वे गोमुख से भी उच्च तुंग तपोवन की प्राकृतिक कंदरा में वास करते थे। उनके तपोबल का ऐसा अप्रतिम प्रताप था कि वे सुदूर बैठे भक्तों के अंतर्मन की बात सहज ही जान लेते थे और आगामी आपदाओं से रक्षा के अचूक उपाय बता देते थे। उनके एक शिष्य मेरे परमपूज्य गुरुदेव श्रद्धेय श्री श्याम चरण दास जी महाराज हैं। 88 वर्ष की इस वयोवृद्ध अवस्था में भी वे नित्य भोर से ही भगवत्पूजन, यज्ञ-हवन और अनवरत भगवन्नाम-जप में लीन रहते हैं तथा श्रीगुरुधाम आश्रम, हरिद्वार में निवास कर रहे हैं।
मेरे कोटि-कोटि जन्मों का सुकृत रहा कि पूज्यपाद गुरुदेव ने मुझे अपनी शरण में लेकर दीक्षा और शिक्षा से मेरे इस जीवन को कृत्कृत्य कर दिया। उनकी ही कृपा से सांसारिक कोलाहल के मध्य भी अतींद्रिय शांति की अनुभूति होती है तथा परमार्थिक कार्यों में सहज अनुराग जगा है। राष्ट्र तथा समाज के हित-चिंतन में प्रौढ़ता आ गई है।
संस्कृत की निरुक्ति के अनुसार, 'गु' का अर्थ है अंधकार और 'रु' का अर्थ है उसका निरोध (विनाश) करने वाला। अर्थात, जो हमें अज्ञान के गर्त से बाहर निकालकर ज्ञान से आलोकित कर दे, वही गुरु है। आज के युग में चारों ओर जहां चकाचौंध और सूचनाओं की बाढ़ आई हुई है, किंतु वास्तविक ज्ञान और जीवन-मूल्य केवल एक समर्थ गुरु ही प्रदान कर सकता है। सूचनाएं हमें साक्षर तो बना सकती हैं, पर गुरु का दिव्य मार्गदर्शन ही हमें 'विवेकशील' बनाता है।
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वे हमारी सुप्त अंतर्निहित क्षमताओं को पहचानकर उन्हें सही दिशा देते हैं। गुरु पूर्णिमा का यह पावन अवसर यह बोध कराता है कि हम भले ही सर्वोच्च मुकाम पर पहुंच जाएं, पर हमारे भीतर का 'शिष्यत्व' सदैव जीवंत रहना चाहिए। अहंकार का समूल विसर्जन कर गुरु-चरणों में संपूर्ण समर्पण ही ज्ञान-महासागर की प्रथम सीढ़ी है।