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    श्रीरामकिंकर महाराज का दर्शन: भाव हो या आलस्य, बस राम नाम जपते रहें; प्रभु स्वयं करेंगे पार

    Updated: Mon, 27 Jul 2026 01:20 PM (IST)

    आषाढ़ मास की पूर्णिमा श्रद्धा, कृतज्ञता, पूर्ण समर्पण और आत्म-अवलोकन का एक महोत्सव है। गुरुपूर्णिमा (29 जुलाई) के पावन अवसर पर आध्यात्मिक गुरुजन अपने ...और पढ़ें

    भाव हो या आलस्य, बस राम नाम जपते रहें, प्रभु स्वयं करेंगे पार

    भाव हो या आलस्य, बस राम नाम जपते रहें, प्रभु स्वयं करेंगे पार

    स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। गुरु मात्र ज्ञान प्रदाता अथवा शिक्षक नहीं होता, वह जीवन को उच्चादर्शों का विवेक देने वाला प्रकाशपुंज होता है, जो शिष्य के व्यक्तित्व को आकार देता है। वही ब्रह्मा-विष्णु-महेश है और वही साक्षात ईश्वर है। गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु शिष्य की सनातन परंपरा को नमन करने और अपने गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।

    "श्री गुरु चरण सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि

    बरनऊं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।" 

    श्रीरामकिंकर जी महाराज निष्काम शिरोमणि होकर भी साधक की सकामता को कभी वे तुच्छ और हेय दृष्टि से नहीं देखते थे। भक्ति की गंगा कर्म की यमुना तथा ज्ञान की सरस्वती महाराजश्री के वचनों में प्रवहमान होती थी। उनकी गति राम थे, उनकी मति राम थे, जिनकी जिज्ञासा और समाधान भी राम ही थे, उन गुरुदेव श्रीरामकिंकर जी को जब मैंने अबोध स्थिति में देखा और धारण कर लिया तो अब लगता है कि ज्ञान को धारण करने का सर्वोत्तम काल अबोध स्थिति ही होती है।

    पूज्य श्रीरामकिंकर जी महाराज हमारे मात्र मंत्र दाता गुरु ही नहीं रहे, अपितु उन्होंने श्रीरामचरितमानस रूपी अमृतमय वेदघट पिलाया, वह भक्तों के लिए जीवन दर्शन और जीवन मुक्ति है। गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर उनकी चरणों का अभिषेक करके हम धन्यता का अनुभव करते हैं। महाराजश्री ने कहा कि श्रीरामचरितमानस हमारा आस्तिक वांगमय है। यहां भगवान राम ने प्रेममूर्ति श्रीभरत को प्रकट किया। श्रीभरत ने श्रीराम को प्रकट किया। गुरु शिष्य को प्रकट करता है और शिष्य गुरु को प्रकट करता है। गुपुत प्रकट जहं जो जेहि खानिक ही रामचरितमानस का महान दर्शन है।

    हमारे गुरुदेव साधक के अंदर से गुणों को प्रकट करते थे, परिणामस्वरूप उसके हृदय के दोषों का निष्कासन स्वयं हो जाता था। वे जो बोलते, करते और कराते थे, वह सब श्रीरामचरितमानस सम्मत होता था। करुणामय उनका स्वभाव था। स्वयं को अनावश्यक छिपाना और अनावश्यक प्रदर्शन उनका विषय ही नहीं था। जिसमें प्रयास है, वही संसार है। जो ठाकुर जी कराएं, वही कृपा। किसी के दोषों को जान लेने के पश्चात उसी का मंथन करते रहना उनका दर्शन नहीं था। उनके चिंतन में किसी प्रकार का आग्रह था ही नहीं। वे कहते थे भाव से कुभाव से, आलस्य और प्रमाद से, संकोच, लज्जा से, जैसे भी हो राम नाम लेते रहो। रामजी स्वयं तार देंगे।

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