पलायन नहीं, श्रीराम की तरह विपरीत हालातों में अवसर रचें युवा; पिता की आज्ञा को ही मानें सर्वोपरि
युवा वह है, जो अतीत और भविष्य को एक साथ संभाल सकता है। वह एक वर्तमान की देहरी पर रखा एक दीपक है, जिससे भूत और भविष्य दोनों आलोकित होते हैं। इंद्रियों ...और पढ़ें
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भारतीय युवा शक्ति: पलायन छोड़ श्रीराम की तरह अवसर रचें, पिता की आज्ञा सर्वोपरि मानें
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण (सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, श्रीअयोध्या जी)। मनुष्य का जीवन वंश-परंपरा से आगे बढ़ता है। यह आनुवंशिकता मनुष्य को परिवर्तनशील संसार के साथ सुमेलित करने का विज्ञान है। जैसे अनेक प्रकार के गुणमय उत्पाद सतत नए संस्करणों में रूपांतरित होते जाते हैं, ठीक वैसे ही निरंतर नवीन होते जाते जीवन और उससे उपजी अनुभव-परंपरा को अद्यतन करने में पीढ़ियों की भूमिका है। इस पीढ़ीगत जीवन को बालक, युवा और वृद्ध के तीन काल-खंड में पहचाना जाता है। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कहते हैं- बाल जुवान जरठ नर नारी।
समय को तीन आयामों में भूत, भविष्य एवं वर्तमान कहकर व्यवहार किया जाता है। विचारपूर्वक देखने से स्पष्ट होता है कि बालक का सामर्थ्य उसके भविष्य में निहित है, वृद्ध का सामर्थ्य उसके अतीत में निहित है, जबकि जवान का सामर्थ्य उसकी उपादेयता उसके वर्तमान में ही है। वह न तो अतीत की कथाएं कहकर अपना महत्व बता सकता है और न ही भविष्य की संभावनाओं के सहारे अपना आज का प्रयत्न त्याग सकता है। भारत विश्व का युवतर देश है, हमारी जनसांख्यिकी में सर्वाधिक युवक-युवतियां हैं। देश की आधी से भी अधिक जनसंख्या 35 वर्ष अथवा उससे कम है। यह बात उत्साहजनक हो सकती है, यदि हमारे देश की युवाशक्ति अपने यौवन की गुणवत्ता, प्रतिबद्धता और इसकी चरितार्थता को लेकर सजग, सक्षम और सावधान हो।
यौवन का अर्थ क्या है, जवानी किन तत्वों से परिभाषित होती है और कैसे एक महान राष्ट्र अपनी युवाशक्ति का अपने उत्थान में उचित विनियोग कर सकता है, यह एक विचारणीय बात है। सामान्यतया, युवावस्था जैविक आयु से निर्धारित होती है। हारीत स्मृति के अनुसार, 16 वर्ष से पूर्व बालावस्था तथा 16 से 35 वर्ष तक की आयु युवावस्था है- ‘आषोडशाद्भवेद्बालः पंचत्रिंशत् युवा नरः।’ इस विचार में वर्ष गणना को लेकर कुछ अन्य मत भी हैं। एक नीतिकथन के अनुसार संतान का पांच वर्ष तक लालन (दुलार) तथा पांच से 15 वर्ष तक ताडन (शिक्षण) करना चाहिए और 16वें वर्ष में प्रवेश करते ही उसके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। इस कथन की गहराई में जाएंगे तो युवावस्था की मूल प्रकृति समझ में आएगी।
मेदिनीकोश में युवावस्था को परिभाषित करते हुए कहा गया है- ‘निसर्गबलशाली।’ अर्थात वह, जिसका बल कृत्रिम न होकर प्रकृतिसिद्ध हो, देह-इंद्रिय और प्राणों का बल। यह बल दुर्दमनीय है, इसको दबाया नहीं जा सकता, इसलिए युवावस्था को प्राप्त संतान भी दमनीय नहीं रह जाती। इस परिभाषा को समझते हुए हमारा ध्यान बालक-बालिका की निर्माण-प्रक्रिया की ओर जाना चाहिए। किशोरावस्था में यदि उनके शिक्षा-संस्कार का उचित विधान नहीं हुआ तो उनका युवाकाल स्वयं उनके लिए तथा परिवार एवं समाज के लिए भी एक चुनौती बनकर उपस्थित होता है। उनका प्रकृतिप्राप्त बल यदि संस्कृति से समन्वित न हो तो उससे राष्ट्र-सेवा की अपेक्षा अर्थहीन हो जाती है।
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यहां स्मृतिकार महाराज मनु का कथन ध्यान देने योग्य है। वे कहते हैं, “युवा के समक्ष वृद्ध के आने पर युवा के प्राण ऊपर को उठने लगते हैं। जब वह युवा उनके स्वागतार्थ खड़े होकर उन्हें प्रणामादि करता है, तब असहज हुई प्राणशक्ति पुनः यथास्थान स्थिर हो जाती है। ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति। प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते॥” इस कथन में युवाशक्ति के चरित्र का मूल निहित है। स्वभावतः बलशाली होकर भी जो अभिवादनशील है, जो सीखने और अपने सही होने के प्रति सदैव सतर्क है और जो अपने उपकारियों के प्रति कृतज्ञ होकर प्रत्युपकार हेतु प्रस्तुत है, वह युवा है। यहां यह बात विशेष स्मरणीय है कि इंद्रियों का बल आत्मानुशासन के द्वारा ही सार्थक होता है। अन्यथा उसकी तुलना पशुबल से होने लगेगी। भारत की युवा पीढ़ी अपने यौवन का गर्व करती हुई अपनी भारतीयता की परीक्षा भी करे, यह अत्यावश्यक है। एक बालक को युवा बनाने में जो पीढ़ी बूढ़ी हो चली है, उसका ऋण उतारने की प्रतिज्ञा के बिना जवानी का कोई अर्थ नहीं। अपने बाद युवा होने को बढ़ रही रही पीढ़ी के लिए जो उदाहरण नहीं बन सकती, उस जवानी की कोई कहानी नहीं।
युवा वह है, जो अतीत और भविष्य को एक साथ संभाल सकता है। वह एक वर्तमान की देहरी पर रखा एक दीपक है, जिससे भूत और भविष्य दोनों आलोकित होते हैं। इंद्रियों का बल चरित्र की गुणवत्ता से ही प्रकाशित होता है। अच्छा भोजन उपार्जित कर सकना युवावस्था का बल है, परंतु भूख को अविचल भाव से सह सकना भी उसकी कसौटी है। युवाशक्ति का अर्थ है अपने समय के लिए एक बिना शर्त का आश्वासन। रामायण कथा का एक प्रसंग कहता है कि जब सीताजी की खोज के लिए समुद्र पार करने का प्रश्न हुआ तो जांबवान ने कहा कि मैं बूढ़ा हो गया। जब जवान था तो विराट प्रभु की सात परिक्रमाएं दो घड़ी में कर ली थीं, पर अब सौ योजन समुद्र का लंघन कठिन है। तब हनुमान जी कहते हैं कि आप मुझे आज्ञा दीजिए। जो भी करना है, वह मैं करूंगा। यद्यपि इसके पूर्व हनुमान जी ने भी समुद्र-लंघन नहीं किया है, पर वे जांबवान से निर्देश लेकर निकलते हैं और सफल होते हैं।
युवावस्था अवसर खोजने का नाम नहीं है, यह अवसर रचने का नाम है। श्रीराम ने समुद्र पर पुल बांध दिया। उनसे पूर्व ऐसा किसी ने नहीं किया था। उन्होंने सोचा और आज उसकी कथाएं कही जाती हैं, पर वही श्रीराम जब श्रीजानकी का प्रथम दर्शन करके मुग्ध जो जाते हैं, तो अपने चरित्र की शुचिता का विचार करते हैं। वे धनुष तोड़ देने के बाद भी विवाह हेतु सीताजी का हाथ पकड़ने से पूर्व पिता की आज्ञा की अपेक्षा रखते हैं। महर्षि वाल्मीकि कहते हैं- ‘दीयमानां न तु तदा प्रतिजग्राह राघवः। अविज्ञाय पितुश्छंदमयोध्याधिपतेः प्रभोः।’ युवतर जनसंख्या वाला देश भारत अपनी युवा पीढ़ी को इस भारत-भाव से कितना समृद्ध कर पा रहा है, यह प्रश्न है।
भारतीय स्त्री-पुरुषों का युवावर्ग अपनी आकांक्षाओं का, अपने सपनों का पीछा करने के स्थान पर अपने यथार्थ को स्वीकार करने और उससे अपनी संभावनाओं को निखारने का कार्य करे तो यह देश अधिक गौरव का अनुभव कर सकता है। सफल हुआ युवावर्ग जिस प्रकार अपने देश-काल से बच निकलने को आतुर है, उसमें पलायन की प्रवृत्ति झलकती है। इसके विपरीत उन्हीं परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन के लिए संघर्ष करने और उसे श्रेष्ठतर बनाने की प्रतिबद्धता युवावर्ग के सम्मुख एक दायित्व है। युवा पीढ़ी इस समाज-राष्ट्र का अद्यतन संस्करण है, वह इसके सनातन मूल्यबोध को आगे ले चलने का भार लेने और निभाने को प्रस्तुत हो तो संपूर्ण विश्व हमें केवल उपभोक्ता नहीं, अपितु उदाहरण के रूप में देख सकता है।