भगवान दत्तात्रेय ने समुद्र को माना गुरु, सुख में मर्यादा और दुख में धैर्य रखने की मिली सीख
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया ...और पढ़ें
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भगवान दत्तात्रेय ने समुद्र से सीखा जीवन का गहरा रहस्य
HighLights
भगवान दत्तात्रेय ने समुद्र को अपना गुरु माना
सुख में मर्यादा और दुख में धैर्य रखने की सीख मिली
आंतरिक शांति और गंभीरता बनाए रखने का उपदेश
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम मायाकुंड, ऋषिकेश)। श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में एक आध्यात्मिक दृश्य समुपस्थित होता है, जब धर्म मर्मज्ञ महाराज यदु त्रिकालदर्शी तरुण तेजस्वी और परम शान्त आनन्दमग्न अवधूत भगवान् दत्तात्रेय को देखते हैं, तो उनके मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि संसार में रहते हुए भी, यह अवधूत महाभाग परमानंद और मानसिक शांति में कैसे लीन हैं?
तब वह विनीत भाव से उनसे पूछते हैं, हे परम ज्ञानमय अवधूतवेशधारी भगवन्! आपको देखकर प्रतीत होता है कि जहां सारा संसार वासना, चिंता और दुखों की अग्नि में जल रहा है, वहां आप पूर्णतः निर्द्वंद्व, परम संतुष्ट और आनंदित हैं। आपकी इस अगाध शांति का रहस्य क्या है? प्रश्न सुनकर, भगवान दत्तत्रेय जी महाराज यदु को उनकी जिज्ञासानुरूप उपदेशित करते हैं, हे राजन! आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए मैंने किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि प्रकृति के जड़-चेतन उपादानों को अपना गुरु माना है। मैंने अपने 24 गुरुओं से जीवन की भिन्न-भिन्न कलाएं सीखी हैं। इसी क्रम में मेरे गुरुदेव सागर देव भी हैं, जिनसे मैंने आंतरिक गांभीर्य और साम्यावस्था की शिक्षा ग्रहण की है-
मुनिः प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्ययः।
अनंतपारो ह्यक्षोभ्यः स्तिमितोद इवार्णवः॥
हे राजन! समुद्र की सतह पर चाहे कितनी ही उत्ताल तरंगें और चक्रवात क्यों न उठ रहे हों, उसका अंत:स्थल सदा अक्षोभ्य, शांत और अगाध रहता है। इसी प्रकार, एक कुशल आध्यात्मिक साधक को जीवन के थपेड़ों के बीच भी अपनी आंतरिक प्रसन्नता और गंभीरता को नहीं खोना चाहिए। मनुष्य का व्यक्तित्व इतना गंभीर और दुर्विगाह्य होना चाहिए कि उसकी मानसिक दुर्बलता या भय को कोई भी भांप न सके। हे राजन! समुद्र से मैंने मर्यादा और समभाव की शिक्षा ग्रहण की है-
समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः।
नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः॥
हे राजन! वर्षा ऋतु में जब उफनती नदियां अपने तीव्र वेग के साथ सारा जल समुद्र में उड़ेल देती हैं, तब भी समुद्र अहंकार में आकर अपनी मर्यादा को लांघकर तटों को नहीं डुबोता। इसके विपरीत, जब ग्रीष्मकाल में नदियां सूख जाती हैं और उसे जल मिलना बंद हो जाता है, तब भी समुद्र अभाव के शोक में सूखता नहीं है।
यही स्थिति एक ईश्वर-परायण या आत्म-केंद्रित मनुष्य की होती है। यदि जीवन में वैभव, पद और सफलता की नदियां आकर मिलें, तो उसे अभिमान में अंधा होकर अपनी नैतिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए तथा साथ ही यदि दुर्भाग्यवश सब कुछ छिन जाए, दरिद्रता आ जाए, तो अवसाद या शोक से ग्रसित होकर सूखना नहीं चाहिए।
भगवान दत्तात्रेय महाभाग कहते हैं, हे राजन! बाह्य परिस्थितियां कभी हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, किंतु हमारी आंतरिक प्रतिक्रिया पूर्णतः हमारे वश में है, इसलिए जो साधक समुद्र की भांति विशाल, गंभीर और मर्यादित होना सीख जाता है, वह संसार के थपेड़ों के बीच भी सदा अविचलित रहता है। महाराज यदु और अवधूत दत्तात्रेय का यह संवाद सिद्ध करता है कि प्रकृति का प्रत्येक कण हमें जीवन जीने की कला सिखा रहा है।
यह संवाद इस तथ्य को उजागर करता है कि आध्यात्मिक ज्ञान प्रकृति के कण-कण से मुखरित है। समुद्र-गुरु का यह सात्त्विक और समुदात्त जीवन-दर्शन सिखाता है कि सुख-दुख, लाभ-हानि, और जय-पराजय के द्वन्द्वों में भी शांत, मर्यादित और समरस रहकर कैसे अपने जीवन की नौका को पार लगाया जा सकता है। यदि आज का वैश्विक समाज प्रकृति के इन संदेशों को आत्मसात कर ले, तो न केवल मानसिक विकृतियों और अवसाद का अंत होगा, अपितु संपूर्ण पृथ्वी पर एक संतुलित, मर्यादित और शांतिपूर्ण युग का सूत्रपात हो सकेगा।
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