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    ऋग्वेद से जुड़ी है श्री जगन्नाथ रथयात्रा की परंपरा, शरीर को रथ मानकर होती है परमात्मा की उपासना

    Updated: Mon, 13 Jul 2026 02:58 PM (IST)

    श्रीजगन्नाथ जी संपूर्ण वेदों का स्वरूप हैं और उनकी यह यात्रा वैदिक संस्कृति का जयघोष है। 16 जुलाई से पुरी में आरंभ हो रही जगन्नाथ जी की रथयात्रा पर वि ...और पढ़ें

    श्री जगन्नाथ रथयात्रा: वैदिक परंपरा और गहन दार्शनिक अर्थ (Picture Credit- Instagram)

    श्री जगन्नाथ रथयात्रा: वैदिक परंपरा और गहन दार्शनिक अर्थ (Picture Credit- Instagram)

    HighLights

    1. रथयात्रा की परंपरा ऋग्वेद से चली आ रही है

    2. शरीर को रथ, आत्मा को रथी मानकर परमात्मा की उपासना

    3. जगन्नाथ उपासना में वैदिक व लोकसंस्कृति का अद्भुत समन्वय

    प्रो. शत्रुघ्न पाणिग्राही (अध्यक्ष, स्नातकोत्तर परिषद, श्री जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, श्री विहार, पुरी)। जगत- अर्थात शरीर, जो क्षयशील है, नाथ- शरीर में स्थित अक्षय आत्मा अर्थात जगत में दृश्यमान प्रत्येक जीव जगन्नाथ का स्वरूप है। जगत- अर्थात दृश्यमान प्रकृति, नाथ- प्रकृति को आलोक प्रदान करने वाले सूर्यनारायण। जगत- अर्थात सोमतत्व, नाथ-अर्थात अग्नि। वह अग्नि ही जगन्नाथजी का स्वरूप है। इसका स्पष्ट उल्लेख गीता में पंचदश अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने किया है।

    वेद में कहा गया “अग्निसोमात्मकं जगत”। ‘अग्निर्ह च वृषभश्च धेनुः’ इस ऋग्वेद मंत्र के अनुसार श्रीजगन्नाथ अग्निस्वरूप वृषभ हैं और आल्हादिनी शक्ति राधा अथवा लक्ष्मी जगत रूपी धेनु स्वरूपा है। निरुक्त में विष्णु के लिए ‘नराशंस’- शब्द का प्रयोग हुआ हैं। नरान् शंसते इति विष्णुः। अग्निर्वा अर्थात जो मनुष्यों के द्वारा स्तुति योग्य हो, वह जगन्नाथ हैं। श्रीजगन्नाथ-परब्रह्म परमात्मा, श्रीवलभद्र-जीवात्मा, श्रीसुभद्रा-मायाशक्ति, श्रीसुदर्शन- क्रियाशक्ति के रूप में विद्यमान है।

    श्रीजगन्नाथ-अग्नितत्त्व का प्रतीक हैं (पुरुषशक्ति), अन्य सभी शक्तियां- जलतत्व का प्रतीक हैं, जो उनका ही अंश है (स्त्रीशक्ति)। यथा-स्वरूपशक्ति (बलभद्र), मायाशक्ति (सुभद्रा), तटस्थशक्ति (सुदर्शन)। पुरुषोत्तम श्रीजगन्नाथ महाप्रभु ही सकलजगत का सृष्टि का कारण हैं – यह बताकर श्रीभाष्य के रचयिता विशिष्टाद्वैतवाद के वैष्णवसंप्रदाय के आचार्य रामानुजाचार्य ने श्रीजगन्नाथ जी को वैष्णवधर्म का केंद्रबिंदु के रूप मे स्वीकार किया। चतुर्द्धामूर्तियों के बारे में उनका मत हैं- जगन्नाथ- वासुदेव (परमात्मा), वलभद्र-संकर्षण (जीव), सुभद्रा – प्रद्युम्न (मन), सुदर्शन- अनिरुद्ध (अहंकार)।

    आर्तिक को वासुदेव स्वरूप, अर्थार्थी को संकर्षण स्वरूप, जिज्ञासु को प्रद्युम्न, ज्ञानी को अनिरुद्ध का स्वरूप माना गया हैं। द्वैतवाद का ब्रह्म संप्रदाय के आचार्य आनंदतीर्थ ने पूर्णप्रज्ञभाष्य में वताया हैं कि श्री जगन्नाथ स्वयं साक्षात विष्णु और ब्रह्म स्वरूप हैं। महालक्ष्मी उनका शक्ति हैं। शुद्धाद्वैतवाद के आचार्य वल्लभाचर्य अणुभाष्य में श्री जगन्नाथ जी को आक्षरब्रह्म एवं श्रीकृष्ण के रूप में स्वीकार किया। माध्ववेदांत के समर्थक गौड़ीय वैष्णवधर्म के आचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रीजगन्नाथ जी को राधाकृष्ण का सम्मिलित रूप माना है। ओडिआ भागवत के रचयिता अतिवडी जगन्नाथ दास ने जगन्नाथ जी को श्रीकृष्ण माना।

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    द्वैताद्वैतवाद के प्रवर्तक आचार्य निंबार्क ने वेदांतपारिजात भाष्य में श्री जगन्नाथ जी को सगुण साकार ब्रह्म के रूप में वर्णन किया। उनके मत में श्री जगन्नाथ जी उत्पत्ति, स्थिति, संहार, नियमन, ज्ञान, आवरण, बंध तथा मोक्ष के कर्ता हैं। आचार्यशंकर के अद्वैत दर्शन में चार मुख्य तत्त्व हैं – १.ब्रह्म (जगन्नाथ), २.जीव (बलभद्र), ३. माया (सुभद्रा) ४. सुदर्शन (जगत)। जीव और ब्रह्म एक है, यह वैदिक सिद्धांत हैं - जीवब्रह्मैवनापरः, जीवतस्तत्प्रजायते (बृह.उप-३.९.३२) अहं ब्रह्मास्मि (बृह.उप-१.४.१०) । जैसे सभी नदी समुद्र में अपने अस्तित्व को खो देते है, इस प्रकार माया द्वारा जीव अलग प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म ही हैं। वस्तु में अवस्तु का केवल मात्र आरोप हैं।

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    पुराणों के अनुसार, परमविष्णुभक्त महाराज इंद्रद्युम्न द्वारा साकार विष्णुपूजन हेतु चतुर्द्धामूर्तियों को स्थापित किया था। तब से आज तक पुरुषोत्तम श्रीजगन्नाथ जी की  रथयात्रा चल रही है। श्रीमंदिर में श्रीजगन्नाथ, श्रीबलभद्र, श्रीसुभद्रा तथा श्रीसुदर्शन वर्ष भर विभिन्न अवसरों पर अनेक प्रकार की लीलाएं करते हैं। इन्हीं में से एक है वैदिक महोत्सव रथयात्रा। इस महोत्सव के माध्यम से वैदिक संस्कृति की महिमा का प्रतिपादन किया जाता है, क्योंकि रथयात्रा की परंपरा वैदिक युग से चली आ रही हैं। अतः रथयात्रा के वारे में चारो वेदों में और उपनिषद में भी वर्णन है-

    इंद्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः। रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम्॥ (ऋग्वेद-१.११.१) इस मंत्र में इंद्र का रथारोहण प्रसंग है। वेद में इंद्र को परमात्मा के रूप में बताया गया है। वह इंद्रस्वरूप परमात्मा जगन्नाथ माया के द्वारा विभिन्न रूप को धारण करते हैं- इंद्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते- ऋग्वेद-४.७.३३, इंद्रो राजा जगतो य ईशे- (तै.आरण्यक)। यजुर्वेद में भगवान सूर्यनारायण का रथारोहण मंत्र दृश्यमान हैं-

    आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
    हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥

    प्रकृति को आलोक प्रदान करने वाला सूर्यनारायण ही जगन्नाथ हैं, जो रथ पर विराजमान होकर जगत को दिखते हैं। रथनाभिरिवाभिख्यायेत छिद्रां वा छायां वा पश्येत्- (ऐतरेय.२.४.५)। कठ उपनिषद् (३.३) में शरीर को रथ एवं आत्मा को रथी के रूप में वर्णन किया गया है-

    आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धि तु सारथीं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥

    वैदिक संस्कृति भारत की आत्मा है। रथयात्रा महोत्सव का मुख्य उद्देश्य श्रीजगन्नाथजी की उपासना के माध्यम से वैदिक परंपरा का संरक्षण है।उसका दूसरा नाम ‘घोषयात्रा’। ‘घोष’ शब्द का अर्थ है कल्याण करना। श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा वैदिक, लौकिक, शास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। रथयात्रा के अवसर पर रथप्रतिष्ठा के साथ वैदिक विधि से चतुर्द्धामूर्तियों की विशेष पूजा संपन्न की जाती है। वैदिक परंपरा के अनुसार भगवान श्रीजगन्नाथ समस्त वेदों के अमूर्त स्वरूप माने जाते हैं। चारों वेदों में वर्णित अनेक सिद्धांत और उपासना-पद्धतियां श्रीजगन्नाथजी की आराधना में समाहित हैं। इस कारण यह रथयात्रा उत्सव वैदिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।

    रथयात्रा महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य वेदों के माध्यम से समानता, धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है। श्रीजगन्नाथजी की उपासना में वैदिक संस्कृति और लोकसंस्कृति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। श्रीजगन्नाथ की लीला में मानवता का गूढ़ दर्शन छिपा है। वे ‘सर्वभूतहिताय’ के भाव को मूर्त रूप देते हैं। श्रीजगन्नाथ की उपासना में वर्ण, जाति, भाषा तथा संप्रदाय का कोई भेद नहीं है। उनकी भक्ति मानव को प्रेम, सहिष्णुता, करुणा और समरसता का मार्ग दिखाती है। अतः रथयात्रा महोत्सव का उद्देश्य संपूर्ण विश्व में शांति, सद्भाव और समृद्धि का विस्तार है।

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