दत्तात्रेय का जीवन दर्शन: भ्रमर की तरह सिर्फ ज्ञान लें, मोह में बंधेंगे तो अपनी ताकत खो बैठेंगे
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया ...और पढ़ें
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दत्तात्रेय का जीवन दर्शन: भ्रमर से सीखें ज्ञान और अनासक्ति का पाठ
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम, ऋषिकेश)। श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में भगवान दत्तात्रेय और महाराज यदु के मध्य आध्यात्मिक संलाप का यह पावन प्रसंग मानवीय चेतना के परम समुत्कर्ष और जीवन-प्रबंधन का एक अप्रतिम घोषणापत्र है। भगवान दत्तात्रेय ने जिन 24 गुरुओं का वरण किया, उनमें द्वादश गुरु के रूप में 'भ्रमर' (षट्पद) का स्थान अत्यंत विलक्षण और रहस्यों से परिपूरित है। उन्होंने भ्रमर के जीवनवृत्त से मानव कल्याण और आत्म-उन्नति के दो अत्यंत गूढ़, अलौकिक और व्यावहारिक शिक्षाओं को आत्मसात किया।
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः।
सर्वतः सारमादद्याद् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥
भगवान दत्तात्रेय महाभाग महाराज यदु को उपदेशित करते हैं- "हे राजन्! मकरंद से पूरित उपवन में गुंजन करता हुआ भ्रमर किसी एक पुष्प के रूप-रंग अथवा मोह में आबद्ध होकर उसकी संपदा का क्रूरतापूर्वक दोहन नहीं करता। वह अत्यंत सहजता, सुकुमारता और अनासक्ति के पदचापों के साथ एक पुष्प से दूसरे पुष्प पर विचरता है। वह कली का हिय दुखाए बिना, उसके यौवन और सौंदर्य को अक्षुण्ण रखते हुए, केवल उसके श्रेष्ठांश 'मधु' को आत्मसात कर लेता है। यह संसार भी वैचारिक विविधताओं, मत-मतांतरों और दार्शनिक सिद्धांतों का एक असीम, सुरभित उपवन है। एक सत्य-साधक को कभी भी संकीर्णता के कांटों, दुराग्रह के कुहासे या एकांगी दृष्टिकोण के मरुस्थल में आबद्ध नहीं होना चाहिए। उसे सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान से महान शास्त्रों, ग्रंथों तथा संतों के वचनों का निरंतर वैचारिक मंथन करना चाहिए।
जिस प्रकार भ्रमर का एकमात्र लक्ष्य पुष्पों का बाह्य कलेवर नहीं, वरन उसका अंतर्निहित 'मधु' है, उसी प्रकार मानव-जीवन का चरम ध्येय भी संसार के प्रपंचों में उलझना नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे 'परम सत्य' और 'आत्म-तत्व' रूपी सुधारस का पान करना चाहिए। महाराज यदु से भगवान दत्तात्रेय कहते हैं, हे राजन! भ्रमर के जीवन का एक दूसरा कारुणिक, मर्मभेदी और चेतावनी-भरा पक्ष भी है, जो नियति के क्रूर परिहास को रेखांकित करता है। भ्रमर के पैरों और डंक में इतनी शक्ति होती है कि वह कठोर से कठोर काष्ठ को भी सहजता से बेध देता है; वही भ्रमर संध्या की वेला में कमल के बाह्य लावण्य और उसकी मादक सुगंध के वशीभूत हो जाता है। वह अपनी असीम सामर्थ्य और शौर्य को विस्मृत कर बैठता है।
रात्रि के अंधकार की ओट में जब सूर्य अस्ताचल को जाता है और कमल की कोमल पंखुड़ियां बंद होने लगती हैं, तब वह अपनी तीव्र आसक्ति और मोह-पाश के कारण उस सुकुमार बंधन को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास नहीं करता। वह मंद-मंद सुवासित वायु में डोलते हुए सुनहरे भविष्य की कल्पना में डूब जाता है। रात्रि बीतेगी, नया सवेरा होगा, सूर्य उदित होगा और यह कमल पुनः खिलेगा और मैं फिर इसके मकरंद का रसास्वादन करूंगा। इसी बीच कोई मदांध गजराज काल का रूप धरकर आता है और उस कमलिनी को अपने विशाल पैरों तले बेरहमी से कुचल देता है अथवा वह भ्रमर उसी कोमल पंखुड़ियों के कारागार के भीतर घुट-घुटकर अपने प्राणों की आहुति दे देता है।
हे राजन! जो वज्र को भेद सकता था, वह एक सुकुमार कली का कैदी बन गया! यही आसक्ति की पराकाष्ठा है। जो आध्यात्मिक साधक भौतिक सुख-सुविधाओं, क्षणभंगुर वासनाओं और बाह्य आकर्षणों के प्रति आसक्त हो जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी आंतरिक क्षमता, विवेक की दीप्ति और संघर्ष करने का शौर्य खो बैठता है। नश्वर संसार का यह मखमली वैभव-बंधन अंततः आत्मोन्नति के पंखों को कतर देता है।
भगवान दत्तात्रेय का यह उपदेश तमस में भटके मनुष्य का मार्गदर्शन करता रहेगा। जीवन की वास्तविक गरिमा और सार्थकता संसार से केवल 'सार-ग्रहण' करने में है, उसके 'मोह-पाश' में विलीन होकर अस्तित्व मिटाने में नहीं। हमें संसार के इस सागर में इस प्रकार जीवन-यापन करना चाहिए जैसे जल की उत्ताल, उत्कट तरंगों के ऊपर कोई नौका तैरती है। जब तक नौका जल के ऊपर है, तब तक यात्रा निर्विघ्न और आनंदमयी है, किंतु जैसे ही वह जल (संसार) नौका (मन) के भीतर प्रवेश कर जाता है, जलसमाधि सुनिश्चित हो जाती है। संसार में रहकर भी संसार को अपने भीतर न आने देना, जगत के प्रपंचों के कोलाहल के मध्य भी अंतःकरण को पूर्णतः अनासक्त और शांत रखना ही मानसिक शांति, परमार्थिक समुन्नति का एकमात्र दिव्यमार्ग है।
