मानसिक तनाव होगा छूमंतर! बस अपनाएं ये नियम, जो बदल देंगे आपका जीवन
भगवान ने पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से इस विराट ब्रह्मांड की संरचना की और स्वयं ही अंतर्यामी रूप में इसमें प्रविष्ट हो गए। यहां एक ग ...और पढ़ें

वास्तविक शांति केवल सत्संग और आत्म-अनुशीलन से ही संभव है

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
आचार्य नारायण दास (मायाकुण्ड, ऋषिकेश)। वर्तमान कालखंड में मनुष्य भौतिक चकाचौंध को ही चरम सत्य मान बैठा है। विडंबना यह है कि उसके जीवन में सुख-सुविधाओं के साधन तो अपरिमित हुए हैं, किंतु अंतर्मन की शांति मृग-मरीचिका बन गई है। महाराज निमि और नौ योगीश्वरों के मध्य चल रहे आध्यात्मिक संवाद के अनुरूप पुनः राजा निमि ने पूछा, हे योगीश्वरों!
भगवान अपने भक्तों के वशीभूत होकर, अनेक अवतार लेते हैं, अनेक लीलाएं करते हैं अथवा जो करेंगे या कर चुके हैं, हे महानुभाव हमें इस मर्म को समझाइए।
यानि यानीह कर्माणियैर्यैः स्वच्छदजन्मभिः।
चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु नः।।
वस्तुतः उक्त संवाद जीवन की अशांति के तिमिर को मिटाकर, जीवन प्रबंधन को प्रकाशित और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। जिज्ञासा, शरणागति और विनम्रता इस संवाद का मूलाधार है। राजा निमि अपनी जिज्ञासानुरूप भगवान की लीलाओं और उनके दिव्य अवतारों के रहस्य के विषय में प्रश्न करते हैं। यह प्रश्न केवल राजा का नहीं रह जाता, अपितु हर उस मुमुक्षु हो जाता है, जो इस सृष्टि के 'आदिकर्ता' को समझने को लालायित है।
नौ योगीश्वरों में से सातवें योगीश्वर द्रुमिल महाभाग ने राजा की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा, "हे राजन! जो परमात्मा के अनंत गुणों को अपनी बुद्धि से गिनने का प्रयास करता है, वह उस अबोध बालक के समान है, जो आकाश को मुट्ठी में बांधना चाहता है।" यहीं से दर्शन का प्रथम सूत्र प्रस्फुटित होता है- विनम्रता। जब तक मनुष्य अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं करता और कर्तापन का अहंकार नहीं त्यागता, तब तक वह उस 'अनंत' की सत्ता का साक्षात्कार नहीं कर सकता।
भगवान ने पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से इस विराट ब्रह्मांड की संरचना की और स्वयं ही अंतर्यामी रूप में इसमें प्रविष्ट हो गए। यहां एक गूढ़ जीवन-शिक्षा निहित है, हम सब एक ही दैवीय ऊर्जा के विस्तार हैं। जैसे शरीर के बिना इंद्रियां जड़ हैं, वैसे ही परमात्मा के बिना बुद्धि की प्रखरता और प्राणों का स्पंदन निस्तेज है। सृष्टि की समुत्पत्ति में रजोगुण, स्थिति में सत्वगुण और शमन (संहार) में तमोगुण प्रभावित रहता है। निरंतर चलने वाला काल चक्र संदेश देता है, संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है।
खबरें और भी
इस 'अनित्यता' को सहर्ष स्वीकार कर लेना ही समस्त संतापों से मुक्ति का एकमात्र सोपान है। उक्त संवाद में केवल वैराग्य की प्रधानता नहीं है, अपितु उच्च कोटि के जीवन प्रबंधन के सूत्र भी गुंफित हैं। इंद्रियों का 'ओज' और शरीर का 'बल' उसी परम सत्ता की देन है। आधुनिक प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो एक सफल नेतृत्वकर्ता वही है, जो यह समझे कि उसकी क्षमता का मूल स्रोत पद या अधिकार नहीं, बल्कि उसका आत्मबल और नैतिक मूल्य है।
अनंतकोटि ब्रह्मांडनायक आदिपुरुष नारायण ने जगत के संचालन हेतु ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूप में उत्तरदायित्वों का जो स्पष्ट विभाजन किया है, वह कुशल प्रशासन का समुत्कृष्ट समुदाहरण है। भगवान अपनी लीलाएं स्वतंत्र होकर करते हैं, वे कर्म से बंधते नहीं हैं। यही वह स्थिति है, जहां व्यक्ति 'परिणाम के तनाव' से मुक्त होकर अपने 'श्रेष्ठतम प्रदर्शन' की ओर अग्रसर होता है। अशांति से आनंद की ओर इस संवाद का सार है। भौतिक उपलब्धियां क्षणभंगुर हैं; वास्तविक शांति केवल सत्संग और आत्म-अनुशीलन से ही संभव है।
जब मनुष्य यह अनुभव कर लेता है कि वह स्वयं 'कर्ता' नहीं, बल्कि उस जगदाधार की शक्ति का एक 'माध्यम' मात्र है, तब उसके जीवन से तनाव, संशय और अहंकार स्वतः विदा हो जाते हैं। यही जीवन-दर्शन का चरमोत्कर्ष है। श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग हमें केवल धार्मिक अनुष्ठानों अथवा कथाओं तक सीमित नहीं रखता, अपितु हमें ऐसी द्रष्टा-दृष्टि प्रदान करता है, जिससे हम संसार के कोलाहल में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रह सकें।
जिस दिन मनुष्य अपने सामर्थ्य का मूल स्रोत परमात्मा को मान लेगा, उस दिन से उसका 'जीवन प्रबंधन' संपूर्णता को प्राप्त कर लेगा। भौतिकता की अंधी दौड़ में भाग रहे अशांत और व्याकुल मनुष्य के लिए यह संवाद 'मानसिक शांति' (Stress Management Tips) का सबसे प्रभावी महामंत्र है।