सृजनात्मकता का नियम: जितना शांत रहेगा मन, उतने ही उत्तम होंगे परिणाम
धारणा है कि सृजनात्मकता के लिए अशांति और उद्विग्नता की आवश्यकता होती है, लेकिन यह भ्रांति है। शांति और मौन में सृजनात्मकता सहज ही घटित होती है... ...और पढ़ें
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श्री श्री रवि शंकर के विचार
श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु)। गहन मौन सृजनात्मकता का उत्प्रेरक है। जो व्यक्ति अत्यधिक व्यस्त, चिंतित, अति-महत्वाकांक्षी अथवा आलसी हो, उससे सृजनात्मकता की उत्पत्ति नहीं हो सकती। एक अशांत व्यक्ति आविष्कारक नहीं हो सकता। मन और शरीर विपरीत नियमों पर कार्य करते हैं। शारीरिक स्तर पर जितना अधिक प्रयास होगा, परिणाम उतना ही उत्तम होगा। जबकि मानसिक या सृजनात्मकता के स्तर पर, प्रयास जितना कम होगा, परिणाम उतना ही उत्तम होगा।
जब मन विश्राम करना सीख जाता है, तब नए विचारों का आविर्भाव होता है। क्या आपने देखा है कि यदि आप कुछ भूल गए हैं, तो उसे याद करने का जितना अधिक प्रयास करते हैं, उसे याद करने में उतना ही अधिक समय लगता है? जब आप प्रयास को छोड़कर विश्राम करते है तब स्मरण स्वतः ही घटित होता है।
शांत अवस्था सृजनात्मकता की जननी है
सामान्यतः यह धारणा है कि सृजनात्मकता के लिए अशांत व उद्विग्न होना आवश्यक है। कुछ महान विचारकों व वैज्ञानिकों के बारे में जिन्होंने बड़े सृजनात्मक कार्य किये, माना जाता है कि वे अशांत व उद्विग्न स्वभाव के थे। किंतु वास्तविकता इसके बिलकुल विपरीत है। गहन मौन व चित्त की शांत अवस्था सृजनात्मकता की जननी है।
यदि आप इस पृथ्वी पर प्रत्येक आविष्कार का सूक्ष्मता से अवलोकन करें, तो आप पाएंगे कि यह तब हुआ है, जब वे चरम मानसिक थकावट के बिंदु पर पहुंचे और फिर पूर्णतः शिथिल हो गए थे। पूर्ण विश्राम के उस क्षण में, सृजनात्मकता घटित हुई। यदि अशांति से सृजनात्मकता संभव होती तो विश्व के युद्ध ग्रस्त और अशांत क्षेत्र सृजनात्मकता में सबसे अग्रणी होते, किंतु ऐसा घटित होता दिखाई नहीं देता है।
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आवश्यकता आविष्कार की जननी है - यह विचार कुछ पुराना हो चुका है। कुछ मिनटों का ध्यान, अंतर्मुखी होना, एक अत्यंत विशाल परिवर्तन ला सकता है। संतुलित गतिविधि, विश्राम और योग आपके भीतर कौशल और सृजनात्मकता को प्रज्वलित कर सकते हैं। यदि आप ध्यान की कला जानते हैं, तो आप सृजनात्मकता और आनंद के स्रोत का उपयोग कर सकते हैं।
जब आप भ्रमित हों, तो केवल विश्राम करें। अंतःप्रज्ञा केवल तभी कार्य करती है, जब आपका मन पूर्णतः शांत हो। अन्वेषण और सृजनात्मकता हमारे भीतर से ही प्रकट होते हैं और आध्यात्मिकता अर्थात हमारी आत्मा का अध्ययन, उस स्रोत को प्राप्त करने की तकनीक है। हम स्वयं में जितना अधिक विश्राम करते हैं, उतना ही अधिक हम अपनी सृजनात्मकता और प्रसन्नता को बाहर लाते हैं।
चेतना के प्रत्येक बिंदु पर सृजनात्मकता पहले से ही विद्यमान है और इसका आवाहन किया जा सकता है। कोई भी सृजनात्मक और गतिशील कार्य तभी घटित हो सकता है, जब आप स्वयं को अपने सहज क्षेत्र से परे विस्तृत करते हैं। आप प्रायः यह सोचकर रुक जाते हैं कि आप कुछ नहीं कर सकते, किंतु यदि आप प्रयास करते हैं और वह पहला कदम आगे बढ़ाते हैं, तो आप पाएंगे कि आप अपने सहज क्षेत्र से बंधे हुए नहीं हैं।
संतुलन बनाए रखना जरूरी है
हमारा मन निरंतर अतीत की स्मृतियों या भविष्य की योजनाओं में व्यस्त रहता है। अतीत और भविष्य के मध्य यह वर्तमान का क्षण विस्मृत हो जाता है। अतीत केवल एक स्मृति है और भविष्य केवल एक योजना मात्र है, पर वर्तमान का यह क्षण सदैव हमारे साथ है। जब मन शांत, सहज और पूर्णतः वर्तमान क्षण में स्थित होता है, तब सृजनात्मकता खिल उठती है।
जीवन में सृजनात्मकता और उत्पादकता इन दोनों का संतुलन आवश्यक है। सृजनात्मकता को स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। यदि आपके पास स्वतंत्रता नहीं है तो आप सृजनात्मक नहीं हो सकते और यदि आपके पास अनुशासन नहीं है, तो आप उत्पादक नहीं हो सकते। आपके मन में कोई महान विचार आ सकता है, परंतु उस विचार को फलीभूत करने के लिए अनुशासन आवश्यक होता है। अनेक युवाओं के पास उत्कृष्ट विचार तो होते हैं, किंतु उन्हें वास्तविकता में परिणत करने हेतु आवश्यक अनुशासन नहीं होता।
वहीं कुछ लोग अत्यंत अनुशासित और कुशल प्रबंधक होते हैं, पर उनके पास नए विचारों और सृजनात्मकता के लिए समय नहीं होता। सृजनात्मकता के अभाव में जीवन की कठिन परिस्थितियों और चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना संभव नहीं हो पाता। जब हम चुनौतियों का उचित प्रकार से सामना नहीं कर पाते, तब मन में भय और अनिश्चितता का भाव बना रहता है। अतः जीवन में सृजनात्मकता और उत्पादकता दोनों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
सृजनात्मक जीवन के मार्ग में कुछ अवरोध भी है
प्रथम अवरोध : हमारे अंतर्मन में सदैव एक आंतरिक संवाद चलता रहता है। हम अपने पूर्वाग्रहों के कारण केवल उन्हीं तथ्यों और कथनों को स्वीकार करते हैं, जिनसे हम पूर्व-परिचित हैं। जो कुछ भी हमारी पूर्व स्थापित धारणाओं के अनुकूल नहीं होता हैं, उसे हम तत्काल अस्वीकार कर देते हैं। हमारे मन की यह प्रवृत्ति जो ज्ञात और पूर्व-परिचित धारणाओं को तो स्वीकार करती है, किंतु नवीन धारणाओं और विचारों को अस्वीकार कर देती है, सृजनात्मकता के मुख्य अवरोधों में से एक हैं।
द्वितीय अवरोध : सृजनात्मकता का एक अन्य पक्ष ‘कल्पना’है। अनेक महान अविष्कार किसी विशिष्ट कल्पना को वर्तमान की वास्तविकता से जोड़ने के कारण संभव हुए है। यदि आप केवल वर्तमान समय की वास्तविकता के बारे में विचार करेगें तो सृजनात्मक होना संभव नहीं है और यदि आप केवल कल्पनाओं में खोये रहेंगे, तब भी जीवन के वास्तविक धरातल के साथ संबंध न होने के कारण, सृजनात्मकता का अभाव होगा। अतः सृजनात्मकता के लिए यथार्थ और कल्पना के मध्य संतुलन होना आवश्यक है।
सृजनात्मकता के लिए उचित संतुलन बनाने व अन्य अवरोधों को दूर कर करने के लिए हमें अपने अस्तित्व की सात परतों शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, स्मृति, अहंकार और आत्मा को समझना आवश्यक है। अस्तित्व की इन सात परतों का थोड़ा-सा ज्ञान भी हमारे जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकता है। इस ज्ञान के परिणामस्वरूप हम अधिक जीवंत और बच्चों जैसे बन जाते हैं। हम अपनी श्वास के प्रति सजग नहीं है, हमारी श्वास में जीवन के गहरे रहस्य छिपे हुए हैं। सृजनात्मकता हमारे भीतर से उत्पन्न होती हैं, और अध्यात्म उस स्रोत तक पहुँचने की तकनीक है।