भगवान दत्तात्रेय का संदेश: अजगर की तरह धैर्यवान बनें, जो मिले उसे प्रसाद मानकर ईश्वर पर छोड़ दें जीवन
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया है, जिसमें जीवन प्रबंधन के तत ...और पढ़ें
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भगवान दत्तात्रेय का संदेश: अजगर से सीखें धैर्य और ईश्वर पर पूर्ण समर्पण
आचार्य नारायण दास महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम, मायाकुंड, ऋषिकेश)। भगवान दत्तात्रेय कहते हैं, हे राजन! आध्यात्मिक साधक को अजगर के समान धैर्यवान और निर्विकल्प होना चाहिए। जिस प्रकार अजगर अपनी क्षुधा पूर्ति हेतु वन में न इधर-उधर विचरण करता है और न ही व्याकुल होकर आहार की खोज करता है, अपितु जो कुछ नियति द्वारा जो भी उसे सहज उपलब्ध हो जाता है, उसी को स्वीकार कर संतुष्ट रहता है, उसी प्रकार एक आध्यात्मिक साधक को भी जीवन में प्राप्त वस्तुओं के प्रति अनावश्यक आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए। बिना याचना और मानसिक क्लेश के, जो कुछ ईश्वरकृपा से प्राप्त हो जाए, उसे प्रसादबुद्धि से स्वीकार कर लेना ही साधना का वास्तविक स्वरूप है-
ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा।
यदृच्छयोपपन्नं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः॥
(अजगर की तरह रहकर, जो कुछ भी दैवयोग से (स्वतः) प्राप्त हो जाए,चाहे वह भोजन बहुत स्वादिष्ट हो या नीरस (बेस्वाद), अधिक हो या थोड़ा, उसे चुपचाप ग्रहण कर लेना चाहिए।)
भोजन नीरस हो या सुरस, अल्प हो अथवा विपुल, साधक को न तो उसकी प्राप्ति में उल्लसित होना चाहिए और न ही अभाव में विषादग्रस्त। उसका उद्देश्य केवल शरीर-रक्षा हो, भोग-विलास नहीं। यदि प्रारब्धवश अनेक दिवसों तक भोजन सुलभ न हो, तब भी उसका मन विचलित न हो। वह इसे भी विधाता की इच्छा मानकर शांतचित्त बना रहे। यही आत्मसंयम और धैर्य साधना की वास्तविक कसौटी है।
भगवान दत्तात्रेय आगे उपदेश देते हैं कि यह जीवन प्रारब्ध की प्रबल धारा में प्रवहमान नौका के समान है। मनुष्य असंख्य प्रयासों के उपरांत भी अनेक दुखों से स्वयं को बचा नहीं पाता, क्योंकि पूर्वजन्मों के संस्कार और कर्मफल उसके जीवन को संचालित करते रहते हैं। उसी प्रकार सुख भी बिना विशेष उद्योग के भगवन्मंगलमय विधान से जीवन में अवतरित हो जाते हैं। स्वर्गतुल्य वैभव हो अथवा दुखमय परिस्थितियां, इंद्रियजन्य सुख-दुख जीव के साथ छाया की भांति संलग्न रहते हैं।
हे राजन! जो साधक श्रीगुरुगोविंद कृपा से इस शाश्वत सत्य को जान लेता है, वह न तो सुख की मृगतृष्णा में उन्मत्त होकर दौड़ता है और न ही दुख की विभीषिका से भयभीत होकर पलायन करता है। वह इच्छाओं के चक्रव्यूह से स्वयं को मुक्त कर अनासक्ति के महासागर में स्थित हो जाता है। उसके अंत:करण में एक अद्भुत शांति का उदय होता है, जहां न हर्ष का उद्रेक रहता है और न विषाद का आवेग।
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हे राजन! अजगर को गुरुरूप में स्वीकार कर मैंने यह अमूल्य शिक्षा ग्रहण की कि जीवन केवल पुरुषार्थ का नाम नहीं, अपितु परमात्मा पर पूर्ण समर्पण और अखंड विश्वास भी है। जो जीव अपनी समस्त इच्छाओं की डोर ईश्वर के करकमलों में सौंप देता है, वही वास्तविक आनंद और परम संतोष का अनुभव प्राप्त करता है।