Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    संकल्पों से बनता है भाग्य: 'कमी है' बोलने से आती है दरिद्रता, सकारात्मक सोच से जीवन को बनाएं समृद्ध

    Updated: Mon, 29 Jun 2026 02:09 PM (GMT+05:30)

    हमारे सोच ही हमारे जीवन का संस्कार बनता है। इसलिए हमें सदा ही अपने सोच को सकारात्मकता से अनुप्राणित रखना चाहिए। ऐसे में जो संस्कार उत्पन्न होंगे, वे ज ...और पढ़ें

    अपने संकल्पों से बनाएं भाग्य सकारात्मक सोच से जीवन को करें समृद्ध

    अपने संकल्पों से बनाएं भाग्य सकारात्मक सोच से जीवन को करें समृद्ध

    ब्रह्मा कुमारी शिवानी (प्रेरक वक्ता)। मन को शक्तिशाली बनाने के लिए हमें हमेशा सकारात्मक चीजों की आवश्यकता होती है, इसलिए हमें कम ऊर्जा वाली सामग्री को स्वीकार या ग्रहण करना नहीं चाहिए। इसके लिए हमें अपने घरों में एक छोटा-सा पोस्टर लगाना चाहिए कि जो भी हम देखते, पढ़ते, सुनते हैं, उससे हमारी सोच बनती है। सोच से हमारी भावना, दृष्टि, वृत्ति, कर्म, व्यवहार और संस्कार बनते हैं। यही संस्कार हमारे जीवन का भाग्य बनाते व बिगाड़ते हैं।

    अर्थात, जो हम देखते, पढ़ते वा सुनते हैं उसका असर हमारे कर्म और जीवन पर पड़ता है। हमें यदि अपनी भाग्य को अच्छा बनाना है, तो हमें सबसे पहले अपने मन को अच्छा संकल्प देने की जरूरत है। हमारा पूरा ध्यान हमारे मन के संकल्पों की गुणवत्ता पर होना चाहिए, क्योंकि शुद्ध, श्रेष्ठ वा शक्तिशाली संकल्प हमें ऊर्जावान बनाते हैं और अशुद्ध, निकृष्ट वा कमजोर संकल्प हमें शक्तिहीन बनाते हैं। इसलिए कभी भी हमें कमी, कमजोरी तथा अयोग्यता वाले संकल्प, बोल वा आचरण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनमें बहुत कम वाइब्रेशनल एनर्जी (कंपन ऊर्जी) होती है। कभी भी हमें अपने समय, सेहत, धन, सुख, शांति, प्रसन्नता व संबंधों के लिए यह नहीं कहना चाहिए कि यह मेरे पास यह चीज नहीं है। जितना ही हम कहते हैं कि मेरे पास इन चीजों की कमी है (या यह मुझे चाहिए), तो उतना ये चीजें हमसे दूर भागती हैं। अत: हमेशा अपने मन को बताना है कि इन सब चीजों से मैं समृद्ध हूं, मेरे पास कोई कमी नहीं है।

    किसी भी चीज की कमी या समृद्धि उसके आकार व परिमाण पर नहीं, बल्कि हमारे सोच पर निर्भर करता है। पुराने समय में हमारे घर छोटे थे, मगर उसमें मिल-जुलकर रहने के लिए हमारे दिलों में भरपूर जगह थी। आज घर बड़ा है, पर उसमें जगह कम पड़ गई है, क्योंकि हमारे सोच में कमी आ गई। पहले धन कम था, लेकिन मदद करने के लिए सब तैयार रहते थे। हम कहते थे, हमारा घर छोटा है, पर दिल बड़ा है, जिसमें क्षमता से अधिक लोग समा सकते हैं। आज हमारा सोच छोटा होता जा रहा है, उसे हमे बड़ा करना है। असल में संकुचित सोच के कारण हमारी भावना व दृष्टिकोण में कमी आ गई है। पहले जब घर में रोटी बनती थी तो गुंधे हुए आटे के ऊपर कपड़ा ढक देते थे, ताकि उसे देखकर कोई कमी-बेशी की बात न सोच लें। रोटी की मांग करने पर जवाब मिलता था- बहुत है, भरपूर है, जितना चाहे रोटी ले सकते हो। आज हम जब खाने-पीने की चीजों में कम होने की आशंका रूपी कमजोर संकल्प डालते हैं, तो धीरे-धीरे उसमें कमी आ ही जाती है। क्योंकि हमारे मन का आसर अन्न पर पड़ता है।

    मंदिर, गुरुद्वारों व आश्रमों में बना हुआ प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता है, क्योंकि वह किसी एक व्यक्ति का नहीं, भगवान का घर है। भगवान का घर सदा भरपूर रहता है, क्योंकि वहां कभी कमी वाला कोई सोच नहीं रहता कि कहीं कम न पड़ जाए। इसी तरह हमें अपने सोच व संकल्प की कंपन तरंगों को ऊंची गुणवत्ता की ऊर्जा में बदलना है और उसी कंपन तरंगों से अपने अन्न, धन, समय, शरीर, रिश्तों एवं परिवार के लिए फलने-फूलने की संकल्प देते रहना है।

    खबरें और भी

    कई बार हम अपनी बच्चों के लिए भी निम्न स्तर की ऊर्जा वाले संकल्प व बात कर लेते हैं कि यह बच्चा कम बुद्धि वाला है, क्या करेगा यह बड़ा होकर? जब आपके पड़ोसी आपकी बच्चे के लिए ऐसा कुछ कहने पर आपको बुरा लगता है, तो फिर आप खुद अपने बच्चे के लिए ऐसा कैसे सोच या कह सकते हैं? यदि आपके बच्चे में वास्तव में कोई कमी है, तब भी आप उसे दुआएं, हिम्मत वा हौसला दे कर उसके असंभव को संभव बना सकते हैं। ऐसे बहुत अभिभावकों व अध्यापकों के उदाहरण है, जिन्होंने बच्चों में असंभव को संभव कर दिखाया है, सिर्फ अपने सही सोच व प्रेरणादायी बोल के बल पर। हमे भी ऐसा ही करना है। हमें अपने को यह सोच देना है कि हम निश्चित रूप में श्रेष्ठ तथा विशेष आत्मा हैं, जो अपने शब्द, सोच, बोल, भावना और तरंगों को हमेशा उच्च गुणवत्ता वाला बनाकर रखता है।

    हमें स्वयं को हमेशा श्रेष्ठ व महान आत्मा के रूप में देखना है। जहां हम रहते हैं, उस स्थान की कंपन तरंगों को भी हमें उच्च गुणवत्ता वाला (सकारात्मक) बनाना है। हमारा भोजन भी सात्विक हो, जो प्रसाद समान हो। यदि हमें संतों के समान अपने संकल्पों की कंपन तरंगों को ऊपर उठाना है, तो हमें अपनी अन्न व पानी पर विशेष ध्यान देना है। हमारा भोजन सात्विक हो और सात्विक तरीके से बनाया गया हो अर्थात हमें यह देखना है कि हम कहां तक तन और मन से स्वच्छ व शुद्ध होकर भोजन बनाते हैं! अपनी रसोई को भगवान का भंडारा समझें। उसमें सिर्फ प्रसाद ही बने और प्रसाद भगवान की याद में रहकर बनाया जाए। बनाए हुए भोजन का भगवान को भोग लगाएं तथा इस प्रसाद को प्रभु स्मृति में रहकर ही स्वीकार करें।

    तभी हमारी मन-बुद्धि शांत, स्थिर, शीतल, सात्विक व संतुलित रहेंगे, हमारी वाणी प्रेरणादायी होगी, रिश्तों में सद्भाव होगी एवं हमारा जीवन आनंदपूर्ण बनेगा, क्योंकि कहा गया है जैसा अन्न वैसा मन और जैसा पाणी, वैसी वाणी। तो, जो चीज हमारे तन व मन के लिए हानिकारक है, उसे तुरंत त्याग देना है। फोन और टीवी से ऐसी बात ग्रहण न करें, जो हमारी मनोस्थिति को नकारात्मक रूप में प्रभावित करे। हम यह सोचें कि हम हैं ही श्रेष्ठ वा संत आत्मा,हमें रोज सत का संग यानि सत्संग करना है, अर्थात प्रतिदिन कुछ समय परमात्मा का ज्ञान सुनना है और उनके ध्यान में रहकर हर कर्म करना है।

    इसी ईश्वरीय स्मृति व सहज राजयोग मेडिटेशन के नियमित अभ्यास से ही हमारे सारे कार्य सहज, सरल व सफल होंगे तथा जीवन के हर स्तर, स्थिति और परिस्थिति में हम स्वस्थ, सुखी, सुरक्षित और सफल रहेंगे। क्योंकि, यह एक आध्यात्मिक सत्य है कि हम ईश्वर को ध्यान में रखेंगे तो ईश्वर हमें ध्यान में रखेंगे। इस ईश्वरीय ज्ञान एवं सहज राजयोग वाले ध्यान को जीवन में अपनाने से ही हमारे जीवन में स्वस्थ, स्थायी, सुखद और सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

    यह भी पढ़ें- श्रीराम ही नहीं, लक्ष्मण भी हैं मर्यादा पुरुषोत्तम: रामचरितमानस का यह अनसुना रहस्य बदल देगा आपकी सोच

    यह भी पढ़ें- मानसिक तनाव और भटकाव दूर करता है गायत्री मंत्र, ऋषियों ने इसे बताया है 4 वेदों का सार